पिछले एक दशक के दो सर्वाधिक चर्चित उच्चतम न्यायालय के निर्णय — एक वह जिसने सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया, और दूसरा वह जिसने व्यभिचार को आपराधिक अपराध मानने वाले प्रावधान को निरस्त किया — अब स्वयं न्यायालय के समक्ष खुलेआम प्रश्नों के घेरे में हैं। केंद्र सरकार ने अब उच्चतम न्यायालय से कहा है कि ये दोनों निर्णय 'संवैधानिक नैतिकता' (constitutional morality) नामक अवधारणा की अत्यधिक विस्तारित व्याख्या पर आधारित थे, और इसी कारण इन्हें संदिग्ध पूर्वनिर्णय माना जाना चाहिए। जिस देश में इन दोनों निर्णयों को व्यापक रूप से इस पाठ्यपुस्तकीय उदाहरण के रूप में पढ़ाया जाता है कि किस प्रकार संविधान बहुसंख्यकवादी अस्वीकृति के विरुद्ध व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है, वहाँ यह कोई मामूली दलील नहीं है।
केंद्र ने सर्वोच्च न्यायालय से कहा कि संवैधानिक नैतिकता 'अच्छे कानून' (गुड लॉ) पर हावी नहीं हो सकती: इसका Navtej Singh Johar और Joseph Shine मामलों की विरासत के लिए क्या अर्थ है
केंद्र सरकार की इस दलील ने कि समलैंगिकता और व्यभिचार को अपराधमुक्त किए जाने का आधार 'संवैधानिक नैतिकता' (constitutional morality) के त्रुटिपूर्ण प्रयोग पर टिका था, इस मूलभूत बहस को फिर से खोल दिया है कि संविधान सामान्य कानून में निहित बहुसंख्यकवादी नैतिकता को कितनी हद तक अधिक्रमित कर सकता है।
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इस कहानी के प्रावधान
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रिपोर्टिंग स्रोत: Centre tells SC adultery, same-sex rulings based on 'constitutional mo… · India Supreme Court ruling could shape the future of LGBTQ rights - 76…