पिछले एक दशक के दो सर्वाधिक चर्चित उच्चतम न्यायालय के निर्णय — एक वह जिसने सहमति से बने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया, और दूसरा वह जिसने व्यभिचार को आपराधिक अपराध मानने वाले प्रावधान को निरस्त किया — अब स्वयं न्यायालय के समक्ष खुलेआम प्रश्नों के घेरे में हैं। केंद्र सरकार ने अब उच्चतम न्यायालय से कहा है कि ये दोनों निर्णय 'संवैधानिक नैतिकता' (constitutional morality) नामक अवधारणा की अत्यधिक विस्तारित व्याख्या पर आधारित थे, और इसी कारण इन्हें संदिग्ध पूर्वनिर्णय माना जाना चाहिए। जिस देश में इन दोनों निर्णयों को व्यापक रूप से इस पाठ्यपुस्तकीय उदाहरण के रूप में पढ़ाया जाता है कि किस प्रकार संविधान बहुसंख्यकवादी अस्वीकृति के विरुद्ध व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करता है, वहाँ यह कोई मामूली दलील नहीं है।