The Constitution of India
अनुच्छेद 137
निर्णयों या आदेशों का उच्चतम न्यायालय द्वारा पुनर्विलोकन
निर्णयों या आदेशों का उच्चतम न्यायालय द्वारा पुनर्विलोकन-संसद् द्वारा बनाई गई किसी विधि के या अनुच्छेद 145 के अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उच्चतम न्यायालय को अपने द्वारा सुनाए गए निर्णय या दिए गए आदेश का पुनर्विलोकन करने की शक्ति होगी ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
सामान्यतः, सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय अनुच्छेद 141 के अंतर्गत अंतिम और बाध्यकारी होता है। किंतु चूंकि सर्वोच्च न्यायालय सर्वोच्च मंच है और उसके ऊपर कोई अपील नहीं, इसलिए संविधान-निर्माताओं ने एक सुरक्षा-वाल्व रखा: अनुच्छेद 137 के तहत न्यायालय अपनी ही पूर्ववर्ती निर्णयों में वास्तविक त्रुटियाँ सुधार सकता है या गंभीर अन्याय का समाधान कर सकता है, ताकि गलतियाँ सदा के लिए असुधार्य न रह जाएँ। यह शक्ति जानबूझकर संकीर्ण और प्रक्रियात्मक है—असाधारण परिस्थितियों के लिए, न कि नियमित दूसरी अपील की तरह।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि समीक्षा कोई साधारण पुनःसुनवाई नहीं है; इसका उद्देश्य केवल “अभिलेख पर प्रत्यक्ष दिखाई देने वाली त्रुटि” अथवा इसी प्रकार के सीमित आधारों को सुधारना है, जैसा कि Sow Chandra Kante v. Sheikh Habib जैसे वादों में प्रतिपादित किया गया और आगे विकसित हुआ। Rupa Ashok Hurra v. Ashok Hurra (2002) में न्यायालय ने एक और कदम बढ़ाते हुए “क्यूरेटिव याचिका” (curative petition) को भी मान्यता दी—यह समीक्षा खारिज होने के बाद उपलब्ध एक और भी संकीर्ण उपचार है, ताकि भयंकर न्याय-विफलता रोकी जा सके—यद्यपि यह क्यूरेटिव अधिकारक्षेत्र सीधे अनुच्छेद 137 से नहीं, बल्कि न्यायालय की निहित शक्तियों से अधिक प्रवाहित होता है। न्यायालयों ने निरंतर जोर दिया है कि अनुच्छेद 137 की समीक्षा का प्रयोग विरल ही होना चाहिए, ताकि निर्णयों की अंतिमता बनी रहे।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: समीक्षा याचिका आपको पूरा मामला फिर से ताज़ा अपील की तरह बहस करने देती है।
तथ्य: अदालतों ने स्पष्ट किया है कि समीक्षा का उद्देश्य केवल निर्णय में स्पष्ट, प्रत्यक्ष त्रुटियों को सुधारना है; पहले से विचारित और अस्वीकार किए गए तर्कों को फिर से खोलने के लिए नहीं।
मिथक: अनुच्छेद 137 स्वयं ‘क्यूरेटिव याचिका’ (curative petition) का उपचार निर्मित करता है।
तथ्य: ‘क्यूरेटिव याचिका’ (curative petition) को सर्वोच्च न्यायालय ने Rupa Ashok Hurra v. Ashok Hurra में अपनी निहित शक्तियों से विकसित किया, जो अनुच्छेद 137 की समीक्षा से परे एक अतिरिक्त सुरक्षा-कवच है।