Skip to content
सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 138

उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता की वृद्धि

उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता की वृद्धि-(1) उच्चतम न्यायालय को संघ सूची के विषयों में से किसी के संबंध में ऐसी अतिरिक्त अधिकारिता और शक्तियां होंगी जो संसद् विधि द्वारा प्रदान करे । (2) यदि संसद् विधि द्वारा उच्चतम न्यायालय द्वारा ऐसी अधिकारिता और शक्तियों के प्रयोग का उपबंध करती है तो उच्चतम न्यायालय को किसी विषय के संबंध में ऐसी अतिरिक्त अधिकारिता और शक्तियां होंगी जो भारत सरकार और किसी राज्य की सरकार विशेष करार द्वारा प्रदान करे ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

संविधान-निर्माताओं को ज्ञात था कि सर्वोच्च न्यायालय की विशिष्ट शक्तियाँ, जो अन्यत्र (जैसे अनुच्छेद 132-136) में दी गई हैं, भविष्य की हर आवश्यकता को नहीं समेट सकतीं। अनुच्छेद 138 को एक लचीले औज़ार के रूप में रचा गया ताकि जैसे-जैसे भारत की कानूनी व प्रशासनिक ज़रूरतें विकसित हों, संसद बिना संविधान संशोधन के न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र का विस्तार कर सके। उपबंध (2) सहकारी संघवाद का प्रावधान भी देता है: यदि केंद्र और कोई राज्य दोनों चाहते हैं कि किसी विशेष विषय पर सर्वोच्च न्यायालय निर्णय करे या पर्यवेक्षण करे, तो वे आपसी सहमति कर सकते हैं—पर यह संसद की स्वीकृति के अधीन होगा—और इस प्रकार संघीय शक्तियों के संतुलन का सम्मान होता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अनुच्छेद 138 की सीधी व्याख्या करने वाले प्रमुख निर्णय कम हैं, क्योंकि यह बार-बार मुकदमों का स्रोत होने के बजाय एक सशक्तिकरण प्रावधान के रूप में कार्य करता है। न्यायालयों ने सामान्यतः इसे इस पुष्टि के रूप में देखा है कि सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार-क्षेत्र मूल संवैधानिक पाठ से सदा के लिए स्थिर नहीं है, बल्कि साधारण विधि द्वारा बढ़ाया जा सकता है। न्यायिक टिप्पणियों ने नोट किया है कि यह सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियों के संबंध में संविधान के लचीले, विकासशील स्वभाव को दर्शाता है, यद्यपि व्यवहार में अनुच्छेद 138(2) का विधायी उपयोग दुर्लभ रहा है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: सर्वोच्च न्यायालय जब चाहे अपना अधिकार-क्षेत्र स्वयं बढ़ा सकता है।

    तथ्य: केवल संसद (कानून बनाकर) ही इस अनुच्छेद के तहत सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार-क्षेत्र बढ़ा सकती है; न्यायालय स्वयं अपने लिए नई शक्तियाँ नहीं दे सकता।

  • मिथक: कोई राज्य और केंद्र संसद की भागीदारी के बिना ही सीधे किसी मामले को सर्वोच्च न्यायालय को सौंप सकते हैं।

    तथ्य: अनुच्छेद 138(2) के तहत, केंद्र और किसी राज्य के बीच हुआ कोई भी विशेष करार तभी प्रभावी होता है जब संसद ऐसा कानून पारित करे जो सर्वोच्च न्यायालय को उस अधिकार-क्षेत्र का प्रयोग करने की अनुमति दे।