प्रारंभ

जो कोई भी परीक्षा के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीशों की सूची याद करने का प्रयास करता है, उसे शीघ्र ही कुछ अजीब बात नज़र आती है: भारत के हाल के कई मुख्य न्यायाधीशों (Chief Justice of India, CJI) ने दो वर्ष से काफी कम समय तक यह पद संभाला है, कुछ ने तो केवल कुछ महीनों तक। यह न तो कोई संयोग है और न ही अस्थिरता का संकेत — यह मुट्ठी भर संवैधानिक प्रावधानों के आपसी क्रियान्वयन का प्रत्यक्ष, यांत्रिक परिणाम है। 1950 से अब तक के प्रत्येक मुख्य न्यायाधीश का ब्योरा रखने वाले एक हालिया संकलन ने इस प्रवृत्ति में जनता की रुचि फिर से जगा दी है, और यह जानना उपयोगी है कि संविधान के ठीक कौन-से प्रावधान इसे उत्पन्न करते हैं, क्योंकि इसका उत्तर इस बारे में बहुत कुछ उजागर करता है कि उच्चतम न्यायालय को किसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द नहीं, बल्कि एक संस्था के रूप में कार्य करने के लिए किस प्रकार डिज़ाइन किया गया है।

क्या हुआ

इस लेख का आधार एक संदर्भ स्रोत है जिसमें उच्चतम न्यायालय की स्थापना के बाद से अब तक के प्रत्येक मुख्य न्यायाधीश की सूची, उनकी नियुक्ति की तिथियों और कार्यकाल की अवधि सहित दी गई है। ऐसी सूचियाँ ठीक इसीलिए उपयोगी होती हैं क्योंकि वे भारतीय न्यायपालिका की एक संरचनात्मक विशेषता को उजागर करती हैं: कई सामान्य विधि (कॉमन लॉ) क्षेत्राधिकारों के विपरीत, जहाँ मुख्य न्यायाधीश एक दशक या उससे अधिक समय तक पद पर रह सकते हैं, भारत के मुख्य न्यायाधीशों का चयन पदस्थ उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के बीच एक सख्त वरिष्ठता क्रम से होता है, और प्रत्येक न्यायाधीश — मुख्य न्यायाधीश सहित — पैंसठ वर्ष की आयु पूर्ण होने पर सेवानिवृत्त हो जाना चाहिए। इन दोनों तथ्यों के संयोजन का अर्थ यह है कि किसी न्यायाधीश का मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यकाल इस बात से सीमित होता है कि वरिष्ठता सूची के शीर्ष पर पहुँचने के दिन और पैंसठ वर्ष की आयु पूर्ण होने के दिन के बीच कितने वर्ष शेष रहते हैं, और जिन न्यायाधीशों को अपने करियर में अपेक्षाकृत देर से उच्चतम न्यायालय में पदोन्नत किया जाता है, उनके लिए यह अंतराल छोटा हो सकता है।

इसके पीछे का विधिक आधार

आरंभिक बिंदु संविधान का अनुच्छेद 124 है, जो उच्चतम न्यायालय की स्थापना करता है और मुख्य न्यायाधीश सहित उसके न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा कार्यकाल को विनियमित करता है। अनुच्छेद 124 यह उपबंधित करता है कि उच्चतम न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करने के बाद की जाएगी जिन्हें राष्ट्रपति आवश्यक समझे, और इसमें एक महत्वपूर्ण परंतुक है: मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त किसी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में, भारत के मुख्य न्यायाधीश से हमेशा परामर्श किया जाना चाहिए। यह अनुच्छेद उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु पैंसठ वर्ष भी निर्धारित करता है, और किसी न्यायाधीश को पद से हटाने के लिए आवश्यक विस्तृत प्रक्रिया — प्रत्येक सदन द्वारा अभिभाषण के पश्चात संसद में विशेष बहुमत से समर्थित प्रस्ताव — भी निर्धारित करता है। हालाँकि, अनुच्छेद 124 के पाठ में कहीं भी स्पष्ट रूप से यह आदेश नहीं दिया गया है कि सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश ही मुख्य न्यायाधीश बनेगा; यह एक परंपरा है जो सरकार और न्यायपालिका के बीच सहमत प्रक्रिया-ज्ञापन (मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर) से मार्गदर्शित होकर तथा 1990 के दशक के निर्णयों की एक शृंखला में न्यायपालिका की अपनी व्याख्या से सुदृढ़ होकर, दशकों की कार्यपालिका-नियुक्तियों में जमकर स्थापित प्रथा बन गई है — इन निर्णयों में यह कहा गया कि अनुच्छेद 124 में प्रयुक्त "परामर्श" शब्द का अर्थ इससे कहीं अधिक निकट है कि नियुक्त किए जाने वाले व्यक्ति के बारे में न्यायपालिका के अपने विचार से सहमति आवश्यक है। यहीं से वह व्यवस्था उत्पन्न होती है जिसे लोकप्रिय रूप से कॉलेजियम प्रणाली (collegium system) कहा जाता है।

अनुच्छेद 126 शीर्ष पद पर रिक्तियों के लिए सुरक्षा-कपाट (सेफ्टी वाल्व) प्रदान करता है: जब मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त हो, या जब पदस्थ मुख्य न्यायाधीश अनुपस्थिति या अन्य किसी कारण से अपने पद के कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हों, तो राष्ट्रपति न्यायालय के किसी अन्य न्यायाधीश को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में वे कर्तव्य निभाने के लिए नियुक्त कर सकते हैं। यह प्रावधान जितना दिखता है उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि वरिष्ठता-और-सेवानिवृत्ति की व्यवस्था के कारण शीर्ष पद पर परिवर्तन बार-बार होते हैं, और न्यायालय की कार्यप्रणाली को थोड़े से प्रशासनिक अंतराल के लिए भी रुकने नहीं दिया जा सकता।

अनुच्छेद 127 एक संबंधित किंतु भिन्न स्थिति से संबंधित है — उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों में से उच्चतम न्यायालय में तदर्थ (ऐड हॉक) न्यायाधीशों की नियुक्ति, जो तब की जाती है जब न्यायालय की बैठक आयोजित करने या जारी रखने के लिए पर्याप्त न्यायाधीश उपलब्ध न हों। अनुच्छेद 128 सेवानिवृत्त उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों (और, विस्तार से, पूर्ववर्ती संघीय न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों) को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में बैठने और कार्य करने के लिए अनुरोध किए जाने की अनुमति देता है, ताकि रिक्तियों के बावजूद संस्था कार्यरत रह सके। साथ में पढ़ने पर, अनुच्छेद 124, 126, 127 और 128 एक सुसंगत योजना बनाते हैं: निश्चित कार्यकाल और अनिवार्य सेवानिवृत्ति पूर्वानुमेय, नियमित रिक्तियाँ उत्पन्न करते हैं, जबकि कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश और तदर्थ/सेवानिवृत्त न्यायाधीश संबंधी प्रावधान इस उथल-पुथल के बावजूद निरंतरता सुनिश्चित करते हैं।

इसकी तुलना उच्च न्यायालयों से करना उपयोगी होगा। अनुच्छेद 217 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और सेवा-शर्तों को विनियमित करता है, जिसमें उनकी अपनी सेवानिवृत्ति की आयु (बासठ वर्ष, जो उच्चतम न्यायालय के पैंसठ वर्ष से भिन्न है) भी शामिल है, और अनुच्छेद 222 एक न्यायाधीश के एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरण से संबंधित है — यह एक ऐसी शक्ति है जिसने स्वयं न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर महत्वपूर्ण संवैधानिक मुकदमेबाज़ी को जन्म दिया है, हालाँकि यह विधि की एक अलग शाखा है। तुलना का सार यह है कि संविधान जानबूझकर न्यायपालिका के हर स्तर पर आयु-आधारित, नियम-बद्ध परिवर्तन की व्यवस्था करता है, न कि अनिश्चितकालीन कार्यकाल की अनुमति देता है, और मुख्य न्यायाधीश का पद केवल वह सबसे दृश्यमान बिंदु है जहाँ यह डिज़ाइन स्पष्ट रूप से नज़र आता है।

अंततः, अनुच्छेद 129 उच्चतम न्यायालय को एक अभिलेख न्यायालय (कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड) घोषित करता है, जिसे स्वयं की अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति प्राप्त है — यह इस बात की याद दिलाता है कि संस्था के प्राधिकार को निरंतर माना जाता है और वह न्यायालय में एक निकाय के रूप में निहित है, न कि मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठने वाले किसी विशेष व्यक्ति में। यही ठीक कारण है कि व्यक्तिगत मुख्य न्यायाधीशों का बार-बार बदलना, संवैधानिक सिद्धांत में, स्वयं न्यायालय के कामकाज या प्राधिकार को बाधित नहीं करता।

यह स्थिति कैसे बनी

संविधान-निर्माण के समय, अनुच्छेद 124 के अंतर्गत न्यायिक नियुक्तियों के लिए संविधान सभा की योजना ने कार्यपालिका को एक औपचारिक भूमिका दी थी, जिसे न्यायपालिका से परामर्श की आवश्यकता से नियंत्रित किया गया था। उच्चतम न्यायालय के आरंभिक कुछ दशकों में, राष्ट्रपति (मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करते हुए) मुख्य न्यायाधीश के चयन में वास्तविक विवेकाधिकार का प्रयोग करते थे, हालाँकि सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश (पुइस्ने जज) को नियुक्त करने की प्रथा जल्दी ही स्थापित हो गई थी और इससे शायद ही कभी विचलन हुआ। इसके बाद 1990 के दशक की न्यायिक व्याख्या ने अनुच्छेद 124 में "परामर्श" के अर्थ को इस रूप में बदल दिया कि इसके लिए वरिष्ठ न्यायाधीशों के सामूहिक विचार से वास्तविक सहमति आवश्यक हो गई, जिससे वरिष्ठता की परंपरा लगभग अपरिवर्तनीय नियम के रूप में सुदृढ़ हो गई और नियुक्तियों में प्रधानता उस व्यवस्था की ओर स्थानांतरित हो गई जिसे कॉलेजियम कहा जाने लगा, जो स्वयं न्यायपालिका के हाथ में थी। चूँकि उच्चतम न्यायालय में वरिष्ठता को उस न्यायालय में न्यायाधीश की पदोन्नति की तिथि से मापा जाता है (न कि उनकी जन्म-तिथि से या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में उनके वर्षों से), और चूँकि पैंसठ वर्ष की सेवानिवृत्ति आयु समान रूप से लागू होती है, इसलिए, मान लीजिए, अपने साठ के दशक के आरंभिक वर्षों में उच्चतम न्यायालय में पदोन्नत किया गया कोई न्यायाधीश वरिष्ठता की सीढ़ी के शीर्ष पर — और इसलिए मुख्य न्यायाधीश बनने के योग्य — अनिवार्य सेवानिवृत्ति से केवल एक या दो वर्ष पहले ही पहुँचेगा। यही गणित है, न कि कोई राजनीतिक जोड़-तोड़, जो मुख्य न्यायाधीशों की किसी भी सूची में दिखने वाले छोटे कार्यकालों को उत्पन्न करता है, विशेष रूप से हाल के वर्षों में जब उच्चतम न्यायालय में पदोन्नतियाँ न्यायाधीशों के करियर में कुछ देर से होने लगी हैं।

व्यवहार में इसका क्या अर्थ है

एक सामान्य वादी के लिए, मुख्य न्यायाधीश का बार-बार बदलना दैनिक स्तर पर सीमित प्रभाव रखता है: मामलों की सुनवाई पीठों द्वारा की जाती है, न कि मुख्य न्यायाधीश द्वारा व्यक्तिगत रूप से निर्णीत की जाती है, और मुख्य न्यायाधीश की विशिष्ट शक्तियाँ बड़े पैमाने पर प्रशासनिक प्रकृति की होती हैं — पीठों के बीच मामलों का आबंटन (तथाकथित "मास्टर ऑफ द रोस्टर" कार्य), संविधान पीठों का गठन, और कार्यपालिका तथा बार के साथ अपने व्यवहार में न्यायालय का प्रतिनिधित्व करना। विधि के विद्यार्थियों और यूपीएससी/न्यायपालिका के अभ्यर्थियों के लिए व्यावहारिक सीख यह है कि प्रत्येक मुख्य न्यायाधीश की सटीक तिथियाँ याद करने का प्रयास छोड़कर इसके स्थान पर इस प्रणाली को समझा जाए: अनुच्छेद 124 के अंतर्गत वरिष्ठता और निश्चित सेवानिवृत्ति आयु मिलकर कार्यकाल की अवधि निर्धारित करती हैं, अनुच्छेद 126 रिक्तियों को कवर करता है, और नियुक्तियों की सिफारिश में कॉलेजियम की भूमिका (जो स्वयं संवैधानिक पाठ में सीधे उल्लिखित नहीं है, बल्कि अनुच्छेद 124 के परामर्श-खंड में पढ़ी जाती है) एक बार-बार पूछा जाने वाला, महत्वपूर्ण विषय है। प्रश्न प्रायः यह परखते हैं कि क्या अभ्यर्थी यह समझता है कि संविधान में कहीं भी "कॉलेजियम" शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है, और यह कि मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए वरिष्ठता की परंपरा स्वयं एक प्रथा है, न कि पाठ्य आदेश।

किन बातों पर नज़र रखें

बिना किसी परिणाम की पूर्वधारणा के दो बातों पर नज़र रखना उपयोगी होगा। पहला, क्या भविष्य के प्रक्रिया-ज्ञापन (मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर) या न्यायिक निर्णय मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए वरिष्ठता की परंपरा में किसी प्रकार का परिवर्तन करते हैं, क्योंकि यह परंपरा — सेवानिवृत्ति की आयु के विपरीत — स्वयं संवैधानिक पाठ द्वारा निर्धारित नहीं है और कभी-कभी इस पर बहस भी हुई है। दूसरा, क्या छोटे कार्यकालों की यह प्रवृत्ति सार्वजनिक विमर्श में समय-समय पर उठाई जाने वाली उन मांगों को फिर से हवा देती है जो या तो मुख्य न्यायाधीश के लिए न्यूनतम सुनिश्चित कार्यकाल की मांग करती हैं या सेवानिवृत्ति की आयु पर पुनर्विचार की; ऐसे किसी भी परिवर्तन के लिए महज़ प्रशासनिक निर्णय के बजाय अनुच्छेद 124 में संवैधानिक संशोधन आवश्यक होगा, क्योंकि आयु और कार्यकाल संबंधी प्रावधान पाठ में सुदृढ़ता से निहित (entrenched) हैं। पाठकों को इस क्षेत्र में किसी भी सुधार प्रस्ताव को तब तक उचित संदेह की दृष्टि से देखना चाहिए जब तक कोई वास्तविक विधेयक या संशोधन प्रस्तुत नहीं किया जाता, क्योंकि मुख्य न्यायाधीश के कार्यकाल को "ठीक करने" को लेकर अधिकांश सार्वजनिक बातचीत अभी तक टिप्पणी मात्र है, लंबित विधि नहीं।