The Constitution of India
अनुच्छेद 127
तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति
तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति— (1) यदि किसी समय उच्चतम न्यायालय के सत्र को आयोजित करने या चालू रखने के लिए उस न्यायालय के न्यायाधीशों की गणपूर्ति प्राप्त न हो तो 1राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग भारत के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा उसे किए गए किसी निर्देश पर, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से] और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श करने के पश्चात्, किसी उच्च न्यायालय के किसी ऐसे न्यायाधीश से, जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए सम्यक्त रूप से अर्हित है और जिसे भारत का मुख्य न्यायमूर्ति नामोदिष्ट करे, न्यायालय की बैठकों में उतनी अवधि के लिए, जितनी आवश्यक हो, तदर्थ न्यायाधीश के रूप में उपस्थित रहने के लिए लिखित रूप में अनुरोध कर सकेगा । (2) इस प्रकार नामोदिष्ट न्यायाधीश का कर्तव्यय होगा कि वह अपने पद के अन्य कर्तव्ययों पर पूर्विकता देकर उस समय और उस अवधि के लिए, जिसके लिए उसकी उपस्थिति अपेक्षित है, उच्चतम न्यायालय की बैठकों में, उपस्थित हो और जब वह इस प्रकार उपस्थित होता है तब उसको उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की सभी अधिकारिता, शक्तियां और विशेषाधिकार होंगे और वह उक्त न्यायाधीश के कर्तव्ययों का निर्वहन करेगा ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
संविधान निर्माताओं ने यह प्रावधान इसलिए रखा कि यदि रिक्तियों, बीमारी या अन्य कारणों से न्यायाधीशों की कमी हो जाए और मामलों की सुनवाई के लिए पर्याप्त सदस्य उपलब्ध न रहें, तब भी सर्वोच्च न्यायालय का कामकाज चलता रहे। कार्यवाही रुकने देने के बजाय, अनुच्छेद 127 एक संवैधानिक तंत्र देता है जिसके माध्यम से किसी योग्य व अनुभवी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को अस्थायी रूप से ‘उधार’ लेकर सर्वोच्च स्तर पर न्याय के प्रशासन की निरंतरता बनाए रखी जा सके।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: अनुच्छेद 127 के तहत नियुक्त अधि-होक (ad hoc) न्यायाधीश के पास एक नियमित सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश से कम शक्ति होती है।
तथ्य: यह अनुच्छेद स्पष्ट रूप से कहता है कि अधि-होक (ad hoc) न्यायाधीश के पास उसकी उपस्थिति के दौरान सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश के सभी अधिकार-क्षेत्र, शक्तियाँ और विशेषाधिकार होते हैं।
मिथक: भारत का मुख्य न्यायाधीश केवल अपने अधिकार से अकेले ही किसी अधि-होक (ad hoc) न्यायाधीश की नियुक्ति कर सकता है।
तथ्य: ऐसी नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सहमति और सम्बंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श आवश्यक है।