The Constitution of India
अनुच्छेद 1
संघ का नाम और राज्यक्षेत्र
संघ का नाम और राज्यक्षेत्र-(1) भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों का संघ होगा । 1(2) राज्य और उनके राज्यक्षेत्र वे होंगे जो पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं ।] (3) भारत के राज्यक्षेत्र में,- (क) राज्यों के राज्यक्षेत्र; 2(ख) पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट संघ राज्यक्षेत्र; और] (ग) ऐसे अन्य राज्यक्षेत्र जो अर्जित किए जाएं, समाविष्ट होंगे ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
जब संविधान का निर्माण हुआ, तब भारत अभी-अभी ब्रिटिश उपनिवेशी शासन से निकला था और उसमें पूर्व ब्रिटिश प्रांत, रियासतें तथा भिन्न इतिहास वाले अन्य क्षेत्र शामिल थे। निर्माताओं को एक ऐसी आरम्भिक धारा चाहिए थी जो देश की पहचान और उसके ‘संघ’ स्वरूप की घोषणा करे, और साथ ही समय के साथ भारत के मानचित्र में परिवर्तन (नए राज्य बनना, क्षेत्रों का पुनर्गठन, या नए भू-भाग का अधिग्रहण) की गुंजाइश छोड़े—बिना देश की परिभाषा बार‑बार बदलने की आवश्यकता के।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि ‘राज्यों का संघ’ का अर्थ यह है कि भारत राज्यों के परस्पर समझौते का परिणाम नहीं है (जैसे, USA), और किसी राज्य को पृथक होने का अधिकार नहीं है—सार्वभौमिकता संविधान से नीचे की ओर प्रवाहित होती है, राज्यों से ऊपर की ओर नहीं। Berubari Union प्रकरण (1960) में न्यायालय ने यह परखा कि क्या भारतीय भूभाग का कोई हिस्सा किसी अन्य देश को सौंपने के लिए संवैधानिक संशोधन आवश्यक है, और अनुच्छेद 1(3)(c) तथा संबंधित प्रावधान भारत की क्षेत्रीय अखंडता के साथ कैसे अंतःक्रिया करते हैं। न्यायालयों ने यह भी माना है कि प्रथम अनुसूची को अनुच्छेद 3 के अंतर्गत बने राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम और समान विधियों के माध्यम से बदला जा सकता है, बिना अनुच्छेद 1 को प्रभावित किए।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: क्योंकि भारत ‘राज्यों का संघ’ है, इसलिए किसी भी राज्य को चाहे तो पृथक होने का अधिकार है।
तथ्य: अदालतों ने ‘राज्यों का संघ’ का अर्थ इसके उलट बताया है: भारत अविनाशी है, और किसी राज्य को संवैधानिक रूप से अलग होने का अधिकार नहीं है।
मिथक: ‘भारत’ और ‘India’ दो अलग-अलग विधिक इकाइयाँ या अलग दर्जे वाले नाम हैं।
तथ्य: अनुच्छेद 1 ‘India’ और ‘Bharat’ को एक ही देश के दो नाम मानता है, और संविधान के पाठ में इन्हें परस्पर विनिमेय रूप से उपयोग करता है।
मिथक: भारत का क्षेत्र अनुच्छेद 1 द्वारा सदा के लिए स्थिर कर दिया गया है और कभी बदला नहीं जा सकता।
तथ्य: स्वयं अनुच्छेद 1(3)(c) नए क्षेत्रों के अधिग्रहण की अनुमति देता है, और संसद अनुच्छेद 3 के अंतर्गत निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए राज्यों की सीमाएँ या प्रथम अनुसूची में परिवर्तन कर सकती है।