The Constitution of India
उद्देशिका
WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved to constitute India into a SOVEREIGN SOCIALIST SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens: JUSTICE, social, economic and political; LIBERTY of thought, expression, belief, faith and worship; EQUALITY of status and of opportunity; and to promote among them all FRATERNITY assuring the dignity of the individual and the unity and integrity of the Nation; IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this twenty-sixth day of November, 1949, do HEREBY ADOPT, ENACT AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
उद्देशिका संविधान सभा ने इस उद्देश्य से लिखी कि एक ही व्यापक वाक्य में बताया जा सके कि भारत ने संविधान क्यों अपनाया और किन मूल्यों से वह संचालित होगा। इसका प्रारूप मुख्यतः बी. एन. राउ ने तैयार किया और लंबी सभा-बहसों के बाद अंतिम रूप दिया गया; यह 1946 में जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत उद्देश्यों के प्रस्ताव की अनुगूंज है। ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द बाद में 1976 में 42वें संवैधानिक संशोधन द्वारा जोड़े गए, हालांकि न्यायालयों ने कहा है कि ये विचार मूल दस्तावेज़ में पहले से अंतर्निहित थे।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
बेहरूबारी यूनियन वाद (1960) में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रारंभ में कहा था कि उद्देशिका संविधान का कानूनी रूप से प्रवर्तनीय भाग नहीं है। यह स्थिति केशवानंद भारती बनाम State of Kerala (1973) में बदली, जहाँ न्यायालय ने माना कि उद्देशिका संविधान का भाग है और उसकी ‘आधारभूत संरचना’ (basic structure) को अभिव्यक्त करती है—लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और विधि का शासन जैसे मूल तत्त्व जिन्हें संसद संशोधन द्वारा भी नष्ट नहीं कर सकती। बाद के मामलों में, जैसे S.R. Bommai बनाम Union of India (1994), न्यायालय ने राज्य की धार्मिक तटस्थता को खतरा पहुँचाने वाली कार्रवाइयों को निरस्त करने के लिए उद्देशिका की धर्मनिरपेक्षता पर भरोसा किया।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कहना गलत है कि उद्देशिका सिर्फ़ सजावटी है और उसका कोई वास्तविक कानूनी प्रभाव नहीं है।
तथ्य: सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती (1973) में ठहराया कि उद्देशिका संविधान का भाग है और उसकी ‘आधारभूत संरचना’ (basic structure) को प्रतिबिंबित करती है, जो संसद के संशोधन-शक्ति की सीमाएँ तय करती है।
मिथक: यह कथन गलत है कि ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द 1949 से ही संविधान में थे।
तथ्य: ये शब्द बाद में 1976 के 42वें संशोधन द्वारा जोड़े गए; हालाँकि न्यायालयों ने कहा है कि इनके निहित मूल मूल्य प्रारंभ से ही संविधान में विद्यमान थे।