Indian Penal Code, 1860
धारा 2
repealedPunishment of offences committed within India
Every person shall be liable to punishment under this Code and not otherwise for every act or omission contrary to the provisions thereof, of which he shall be guilty within India.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
लॉर्ड मैकाले के अधीन मसौदा बनाई गई और 1860 में लागू हुई आईपीसी का उद्देश्य समूचे ब्रिटिश भारत के लिए एकसमान दंड विधि बनाना था, जिससे बिखरे हुए प्रांतीय व निजी-व्यवस्था-आधारित दंड नियमों का स्थान लिया जा सके। धारा 2 संहिता की प्रादेशिक पहुंच निर्धारित करती है: यह भारत की सीमाओं के भीतर उपस्थित हर व्यक्ति पर, नागरिकता की परवाह किए बिना, लागू होती है; इससे भारतीय क्षेत्र में सभी व्यक्तियों पर समान आपराधिक दायित्व सुनिश्चित होता है और यह पुष्ट करती है कि दंड का आधार इसी संहिता के प्रावधान होने चाहिए।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने धारा 2 को भारतीय दंड विधि में प्रादेशिक अधिकारिता के सिद्धांत के रूप में पढ़ा है: भारत के भीतर किए गए अपराधों के लिए संहिता सभी व्यक्तियों—नागरिकों और विदेशियों—पर लागू होती है। न्यायिक निर्णयों ने स्पष्ट किया है कि दायित्व राष्ट्रीयता या निवास-स्थान से नहीं, बल्कि भारतीय क्षेत्र में उपस्थिति और आचरण से उत्पन्न होता है, और ‘and not otherwise’ का अर्थ है कि जब तक कोई विशेष कृत्य स्वयं संहिता द्वारा अपराध के रूप में परिभाषित न हो, तब तक उसके लिए आईपीसी के अंतर्गत दंड नहीं दिया जा सकता।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: केवल भारतीय नागरिकों को ही आईपीसी के तहत दंडित किया जा सकता है।
तथ्य: धारा 2 ‘प्रत्येक व्यक्ति’ पर भारत के भीतर लागू होती है, अर्थात भारतीय भूमि पर अपराध करने वाले विदेशी भी संहिता के अंतर्गत समान रूप से दायित्वपूर्ण हैं।
मिथक: अदालतें किसी ‘बुरे’ कृत्य के लिए, भले ही वह आईपीसी में विशिष्ट रूप से अपराध के रूप में सूचीबद्ध न हो, किसी को भी दंडित कर सकती हैं।
तथ्य: वाक्यांश ‘and not otherwise’ का अर्थ है कि दंड सख्ती से उसी पर आधारित होगा जिसे संहिता स्वयं अपराध के रूप में परिभाषित करती है।