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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 1

repealed

Title and extent of operation of the Code

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

जब 1860 में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन आई.पी.सी. (Indian Penal Code) का मसौदा बना, तब भारत में जम्मू और कश्मीर जैसे देशी रियासतें समान संवैधानिक आधार पर शामिल नहीं थीं। स्वतंत्रता के बाद भी जम्मू और कश्मीर को संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा मिला रहा और वहाँ आई.पी.सी. के स्थान पर अपनी अलग आपराधिक संहिता (रणबीर दंड संहिता) लागू रही। यह अनुभाग उसी ऐतिहासिक और संवैधानिक व्यवस्था को दर्शाता था—अधिनियम का नाम बताकर और उसके क्षेत्रीय लागू क्षेत्र की सीमा रेखा स्पष्ट करके।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने परंपरागत रूप से इस अनुभाग को सरल क्षेत्रीय-प्रयोजन धारा की तरह माना है, जिस पर व्याख्यात्मक विवाद बहुत कम रहा, क्योंकि जम्मू और कश्मीर का अपवर्जन सीधे संविधान के अनुच्छेद 370 के अंतर्गत उसके विशेष दर्जे से प्रवाहित होता था। 2019 में जम्मू और कश्मीर के पुनर्गठन और संबंधित विधिक परिवर्तनों के बाद आई.पी.सी. पूरे भारत में विस्तृत कर दी गई, और यह अपवर्जन धारा अपनी मूल रूप में अब प्रभावी नहीं मानी जाती—यद्यपि वर्तमान स्थिति जानने के लिए पाठक धारा 1 का नवीनतम पाठ अवश्य देख लें।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि भारतीय दंड संहिता कभी भी जम्मू और कश्मीर में लागू नहीं हुई।

    तथ्य: 2019 में जम्मू और कश्मीर की स्थिति से जुड़े विधिक परिवर्तनों के बाद, आई.पी.सी. वहाँ भी लागू कर दी गई और पूर्ववर्ती अलग रणबीर दंड संहिता का स्थान ले लिया।

  • मिथक: धारा 1 अपराधों या दंडों को परिभाषित करती है—यह कथन गलत है।

    तथ्य: धारा 1 केवल अधिनियम का नाम बताती है और मूलतः उसके क्षेत्रीय विस्तार का वर्णन करती थी; यह अपने आप कोई अपराध या दंड निर्मित नहीं करती।