Indian Penal Code, 1860
धारा 3
repealedPunishment of offences committed beyond, but which by law may be tried within, India
Any person liable, by any Indian law, to be tried for an offence committed beyond India shall be dealt with according to the provisions of this Code for any act committed beyond India in the same manner as if such act had been committed within India.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
आईपीसी (IPC) मूलतः भारत की भौगोलिक सीमा के अंदर किए गए कृत्यों के लिए रची गई थी, पर अन्य भारतीय क़ानून (जैसे समुद्री डकैती, विदेश में भारतीय नागरिकों द्वारा अपराध, या वायुयान/जहाज़ पर किए गए अपराध) कभी‑कभी भारत के बाहर किए गए कृत्यों तक भी आपराधिक दायित्व बढ़ा देते हैं। धारा 3 एक सेतु की तरह काम करती है: जब किसी अन्य क़ानून के तहत ऐसा परिराज्य (एक्स्ट्राटेरिटोरियल) दायित्व मौजूद हो, तो आचरण‑शून्य न रहे—इसलिए आईपीसी की परिभाषाएँ और दंड लागू रह सकें। यह औपनिवेशिक दौर के विधि‑निर्माताओं के उस उद्देश्य को दर्शाती है कि आईपीसी एक पूर्ण, सामान्य संहिता हो जो जहाँ‑जहाँ भारतीय अधिकार‑क्षेत्र पहुँचे, भौतिक सीमाओं के पार भी, वहाँ तक लागू हो।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतों ने सामान्यतः धारा 3 को एक यांत्रिक/प्रक्रियात्मक प्रावधान माना है, न कि अधिकार‑क्षेत्र का स्वतंत्र स्रोत: यह अपने आप परिराज्यीय अधिकार‑क्षेत्र उत्पन्न नहीं करती, बल्कि तभी संचालित होती है जब कोई अन्य क़ानून (जैसे धारा 4 आईपीसी, प्रत्यर्पण अधिनियम, या विशेष अधिनियम) ऐसा दायित्व प्रदान करता है। न्यायिक निर्णयों ने रेखांकित किया है कि धारा 3 संगति सुनिश्चित करती है—एक बार अन्यत्र अधिकार‑क्षेत्र स्थापित हो जाए तो, अपराध भारत में हो या विदेश में, आईपीसी के द्रव्य (सबस्टैंटिव) प्रावधान समान रूप से लागू होते हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: धारा 3 अपने आप में भारतीय न्यायालयों को दुनिया में कहीं भी किए गए हर अपराध की सुनवाई का अधिकार दे देती है।
तथ्य: धारा 3 स्वयं अधिकार‑क्षेत्र उत्पन्न नहीं करती; यह तभी लागू होती है जब कोई अन्य भारतीय क़ानून पहले से ही भारत के बाहर किए गए कृत्य के लिए व्यक्ति को मुक़दमे के लिए दायित्वशील बनाता है।
मिथक: धारा 3 केवल भारतीय नागरिकों पर ही लागू होती है।
तथ्य: यह धारा ‘किसी भी भारतीय क़ानून द्वारा दायित्वशील किसी भी व्यक्ति’ का उल्लेख करती है—अतः यदि कोई अन्य क़ानून उन्हें भारत में विचारणीय बनाता है, तो यह गैर‑नागरिकों तक भी फैल सकती है; जैसे विशेष परिस्थितियों में विदेशी अपराधियों को कवर करने वाले विशेष अधिनियम (सरलीकृत).