Indian Penal Code, 1860
धारा 4
repealedExtension of Code to extra-territorial offences
The provisions of this Code apply also to any offence committed by:
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
आम तौर पर दंड विधि क्षेत्रीय होती है—वह किसी देश की सीमाओं के भीतर लागू होती है। पर विधि-निर्माताओं ने माना कि किसी देश के अपने नागरिक, तथा उसके जहाज़ और विमान, विदेश में भी अपने साथ एक प्रकार की ‘राष्ट्रीय पहचान’ लेकर चलते हैं। इसी को ध्यान में रखकर भारतीय दंड संहिता में धारा 4 जोड़ी गई, ताकि केवल भारत की सीमा से बाहर होने के कारण भारतीय नागरिकों और भारतीय ध्वज वाले जहाज़ों/विमानों पर भारतीय क़ानून से बच निकलने की गुंजाइश न रहे; बाद के संशोधनों ने इसे आगे बढ़ाकर भारत में स्थित संगणक संसाधनों को प्रभावित करने वाले कुछ साइबर अपराधों को भी शामिल किया।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने सामान्यतः धारा 4 को भारतीय राज्य की परदेशी-अधिकार-क्षेत्र (एक्स्ट्राटेरिटोरियल जूरिस्डिक्शन) के रूप में पढ़ा है, अर्थात भारतीय नागरिकों पर विदेश में किए गए अपराधों के लिए भी भारतीय दंड संहिता के तहत मुक़दमा चलाया जा सकता है, बशर्ते प्रक्रिया-संबंधी सुरक्षा जैसे अभियोजन से पहले केंद्र सरकार की पूर्व-स्वीकृति (जैसा कि दंड प्रक्रिया संहिता के संबंधित उपबंधों में आवश्यक है) प्राप्त हो। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह विस्तार उस देश के दंड क़ानूनों को निरस्त नहीं करता जहाँ कृत्य वास्तव में हुआ—इसका अर्थ केवल इतना है कि भारत भी अभियोजन का विकल्प चुन सकता है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: भारतीय क़ानून केवल भारत की सीमाओं के भीतर किए गए अपराधों पर ही लागू होता है।
तथ्य: धारा 4 भारतीय दंड संहिता के कुछ उपबंधों का विस्तार भारत के बाहर की विशेष स्थितियों तक करती है, जैसे विदेश में भारतीय नागरिकों द्वारा किए गए अपराध, या भारत में पंजीकृत जहाज़ों और विमानों पर हुए अपराध।
मिथक: केवल यह धारा अपने आप में विदेश में भारतीय क़ानून कब-कब लागू होगा—ऐसी हर स्थिति को सूचीबद्ध करती है।
तथ्य: यह केवल प्रारम्भिक पंक्ति है; वास्तविक श्रेणियाँ उसके बाद आने वाले उपवाक्यों में दी गई हैं, जो यहाँ उपलब्ध पाठ में शामिल नहीं हैं।