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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 5

repealed

Certain laws not to be affected by this Act

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

जब 1860 में आईपीसी का मसौदा बना, तब भारत में सैन्य अनुशासन के लिए पृथक विधिक व्यवस्थाएँ (जैसे आर्टिकल्स ऑफ़ वॉर और बाद में आर्मी एक्ट, नेवी एक्ट, एयर फ़ोर्स एक्ट) तथा विभिन्न क्षेत्रों/विषयों के लिए उपयुक्त स्थानीय या विशेष क़ानून पहले से मौजूद थे। मसौदा-कर्ताओं का उद्देश्य एक एकीकृत सामान्य दंड संहिता बनाना था, पर वे नहीं चाहते थे कि यह अनजाने में इन विशिष्ट ढाँचों—ख़ासकर अधिक कठोर और पृथक रहने वाली सैन्य अनुशासन संबंधी व्यवस्थाओं—को निरस्त कर दे। इसी स्पष्टता के लिए धारा 5 जोड़ी गई, ताकि आईपीसी इन विशेष प्रणालियों के साथ-साथ चले, उनके स्थानापन्न के रूप में नहीं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने सामान्यतः धारा 5 को एक ‘सेविंग क्लॉज़’ (बचाव प्रावधान) के रूप में माना है, जो यह पुष्टि करता है कि विशेष क़ानून—जैसे आर्मी एक्ट, एयर फ़ोर्स एक्ट, नेवी एक्ट और विभिन्न स्थानीय अधिनियम—आईपीसी से स्वतंत्र रूप से लागू रहते हैं। सैन्य अदालत (कोर्ट-मार्शल) और साधारण आपराधिक न्यायालयों के overlapping अधिकार-क्षेत्र की व्याख्या करते समय न्यायालय अक्सर इसी सिद्धांत का संदर्भ देते हैं कि विशेष क़ानून संरक्षित हैं; हालांकि विस्तृत प्रक्रियात्मक तालमेल सामान्यतः स्वयं उन्हीं विशेष क़ानूनों से नियंत्रित होता है, धारा 5 मात्र से नहीं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना कि धारा 5 के कारण पलायन या ग़द्दारी करने वाले सैनिकों को आईपीसी के तहत बिल्कुल भी दंडित नहीं किया जा सकता—गलत निष्कर्ष है।

    तथ्य: धारा 5 केवल विशेष सैन्य क़ानूनों (जैसे आर्मी एक्ट) को आईपीसी के साथ बनाए रखती है; यह अपने आप में किसी कृत्य को अपराध ठहराती या अपराध-मुक्त नहीं करती, और उपयुक्त परिस्थितियों में साधारण आपराधिक क़ानून के लागू होने को नहीं रोकती।

  • मिथक: यह धारा सैनिकों को दंड से बचाने के बारे में नहीं है।

    तथ्य: इसके विपरीत, इसका मर्म यह है कि सैन्य अनुशासन के अलग और प्रायः अधिक कठोर विशेष क़ानून पूर्ण रूप से प्रभावी बने रहें और आईपीसी के सामान्य प्रावधानों से उनका क्षरण न हो।