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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 6

repealed

Definitions in the Code to be understood subject to exceptions

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय दंड संहिता का मसौदा 1830 के दशक में थॉमस बैबिंगटन मैकॉले की विधि आयोग ने तैयार किया और 1860 में इसे अधिनियमित किया गया। मसौदा-निर्माताओं का उद्देश्य बार-बार वही बचाव (जैसे अध्याय IV के सामान्य अपवाद) दोहराने के बजाय एक संक्षिप्त, प्रभावी संहिता बनाना था। धारा 6 को एक प्रारूपण-शॉर्टकट के रूप में जोड़ा गया: यह कानूनी रूप से उन अपवादों को हर परिभाषा और दंड प्रावधान से जोड़ देती है, ताकि संहिता अनावश्यक रूप से दोहरावदार न बने और फिर भी उन बचावों की सार्वत्रिक प्रयोज्यता बनी रहे।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने लगातार धारा 6 को इस पुष्टि के रूप में माना है कि सामान्य अपवाद (धारा 76-106, IPC) हर अपराध-परिभाषा में स्वतः समाहित होकर पढ़े जाते हैं। न्यायालयों ने इसी धारा पर भरोसा करते हुए निजी रक्षा, उन्माद या दुर्घटना जैसे बचाव मान्य किए हैं, भले ही किसी विशेष अपराध-धारा (उदा., धारा 300 के अधीन हत्या) में उनका उल्लेख न हो, और यह रेखांकित किया है कि अपवाद अलग से बाहर जाकर लिए जाने वाले बचाव नहीं, बल्कि स्वयं परिभाषा का हिस्सा हैं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: आपको यह अलग से सिद्ध करना पड़ता है कि कोई सामान्य अपवाद आपके मामले में ‘लागू’ होता है, मानो वह बिल्कुल अलग कानून हो।

    तथ्य: अदालतें धारा 6 को इस अर्थ में पढ़ती हैं कि अपवाद पहले से ही अपराध की परिभाषा में निहित हैं—वे बाहर से जोड़ा गया परिशिष्ट नहीं, बल्कि इस बात का हिस्सा हैं कि अपराध का कानूनी अर्थ क्या है।

  • मिथक: यदि किसी अपराध-धारा में आत्मरक्षा या उन्माद जैसे अपवादों का उल्लेख नहीं है, तो वे बचाव उस अपराध के लिए उपलब्ध नहीं हैं।

    तथ्य: धारा 6 यह स्पष्ट करती है कि सभी सामान्य अपवाद संहिता के हर अपराध पर स्वतः लागू होते हैं, चाहे किसी विशेष धारा में वे दोहराए न गए हों।