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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 7

repealed

Sense of expression once explained

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

दण्ड संहिता बार‑बार कई पदों का प्रयोग करती है (जैसे ‘बेईमानी से’, ‘कपटपूर्वक’, ‘स्वेच्छा से’, ‘दस्तावेज’) और उनमें से कुछ को विशिष्ट धाराओं से जुड़े स्पष्टीकरणों द्वारा सटीक रूप से परिभाषित करती है। यदि धारा 7 जैसा नियम न होता, तो यह उलझन रहती कि क्या ये परिभाषाएँ सिर्फ वहीं तक सीमित हैं या पूरे संहिता में लागू हैं। विधेयक‑निर्माताओं (मैकॉले आयोग) ने धारा 7 इसलिए जोड़ी कि इतने बड़े, संहिताबद्ध क़ानून में भाषा की एकरूपता बनी रहे और न्यायालयों व नागरिकों को यह अटकल न लगानी पड़े कि किसी परिभाषित शब्द का अर्थ धारा‑दर‑धारा बदलता है या नहीं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालय धारा 7 को सदा ही सादे क़ानूनी व्याख्या‑नियम के रूप में मानते आए हैं: एक बार IPC में किसी शब्द की परिभाषा स्पष्टीकरण द्वारा दे दी गई, तो वही परिभाषा उस शब्द के अन्य सभी स्थानों पर पढ़ी जाएगी—जब तक कि प्रसंग ऐसा पढ़ना असम्भव न बना दे। उदाहरणतः ‘बेईमानी से’ (धारा 24) या ‘दस्तावेज’ (धारा 29) जैसे पदों की व्याख्या करते समय, जब वे संहिता के अन्य अपराधों में आए, न्यायालयों ने इसी धारा पर भरोसा किया है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: धारा 7 शब्दों के लिए नई परिभाषाएँ बनाती है।

    तथ्य: यह स्वयं कुछ परिभाषित नहीं करती; यह केवल इतना कहती है कि संहिता में कहीं और दी गई परिभाषाएँ/स्पष्टीकरण पूरे संहिता में सुसंगत रूप से लागू किए जाएँ।

  • मिथक: धारा 7 अन्य क़ानूनों में समझाए गए शब्दों पर भी लागू होती है।

    तथ्य: यह केवल उन्हीं अभिव्यक्तियों पर लागू होती है जिन्हें स्वयं भारतीय दण्ड संहिता में समझाया गया है; अन्य विधियों में मिली परिभाषाओं पर यह लागू नहीं होती।