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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 8

repealed

Gender

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

भारतीय दंड संहिता का मसौदा 1860 के दशक में तैयार हुआ, जब अंग्रेज़ी विधि-लेखन में प्रचलन था कि वास्तविक लिंग चाहे जो हो, ‘किसी भी व्यक्ति’ के लिए संक्षिप्त रूप में पुल्लिंग सर्वनाम इस्तेमाल किए जाएँ। प्रत्येक धारा में “वह या वह (he or she)” दोहराने के बजाय, मसौदा तैयार करने वालों ने (Lord Macaulay की विधि आयोग के नेतृत्व में) यह व्याख्यात्मक प्रावधान जोड़ा ताकि पूरे संहिता को लैंगिक-निरपेक्ष रूप से पढ़ा जा सके और हर जगह दोहराव न करना पड़े। यह 19वीं शताब्दी के क़ानूनों में आम मसौदा-तकनीक को दर्शाता है, न कि लिंग-भूमिकाओं पर कोई मत।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने सामान्यतः धारा 8 को एक सरल व्याख्यात्मक नियम माना है और ‘वह/उसका/उसे’ जैसे शब्दों वाले प्रावधानों में लैंगिक-निरपेक्ष अर्थ लगाने के लिए इसका उपयोग किया है, जब तक कि किसी विशिष्ट अपराध को उसकी अपनी भाषा में स्पष्ट रूप से किसी एक लिंग तक सीमित न किया गया हो (उदाहरणतः, इतिहासतः कुछ धाराओं में केवल पुरुष या केवल स्त्री को ही अपराधी या पीड़ित के रूप में नामित किया गया था)। इस धारा को विवादास्पद नहीं माना गया; यह पृष्ठभूमि में रहकर संहिता की भाषा को व्यापक रूप से लागू बनाए रखती है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना कि धारा 8 के कारण भारतीय दंड संहिता केवल पुरुषों को दंडित करती है, क्योंकि उसमें ‘वह’ कहा गया है—गलत है।

    तथ्य: धारा 8 ठीक इसी गलतफहमी को रोकने के लिए है—यह स्पष्ट करती है कि ‘वह’ का दायरा सभी लिंगों के लोगों को आवृत करता है, जब तक कि कोई विशेष धारा अलग से न कह दे।

  • मिथक: यह धारा यह नीति व्यक्त नहीं करती कि पुरुषों और स्त्रियों के साथ दंड संहिता के तहत अलग-अलग व्यवहार होना चाहिए।

    तथ्य: यह व्याकरण/मसौदा-लेखन की परंपरा है, न कि लिंग-भूमिकाओं या व्यवहार के बारे में कोई सारगत नियम।