Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 84
Presumption as to powers-of-attorney
The Court shall presume that every document purporting to be a power-of-attorney, and to have been executed before, and authenticated by, a Notary Public, or any Court, Judge, Magistrate, Indian Consul or Vice-Consul, or representative of the Central Government, was so executed and authenticated.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान सबसे पहले भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 85 में पाए गए नियम को आगे बढ़ाता है। अभिकर्ता-पत्र (power of attorney) प्रायः किसी व्यक्ति को दूसरे की ओर से विधिक कार्य करने का अधिकार देने के लिए होते हैं, कई बार दूर-दराज़ स्थानों या अलग देशों में भी। हर बार प्रामाणिकता का प्रमाण माँगना लेन-देन और वाद-प्रक्रिया को धीमा कर देता। इसलिए क़ानून एक प्रत्याख्येय (rebuttable) अनुमान बनाता है: यदि दस्तावेज़ दर्शाता है कि वह किसी मान्यता प्राप्त प्राधिकारी (जैसे नोटरी या वाणिज्य दूत) के समक्ष निष्पादित हुआ और उसी ने प्रमाणीकरण किया, तो न्यायालय ताज़ा प्रमाण माँगे बिना उसे असली मान सकते हैं—जब तक कोई वास्तविक चुनौती न हो।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने समान पूर्ववर्ती प्रावधान (भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 85) की व्याख्या करते हुए सामान्यतः माना है कि यह अनुमान प्रत्याख्येय है—अर्थात दस्तावेज़ को जाली या अनुचित रूप से निष्पादित सिद्ध करने का दायित्व उसे विवादित करने वाले पर स्थानांतरित हो जाता है। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह धारणा विशेष रूप से उन्हीं अभिकर्ता-पत्रों पर लागू होती है जिनका प्रमाणीकरण सूचीबद्ध प्राधिकरणों ने किया हो; केवल नोटरीकरण होने मात्र से यह धारणा हर प्रकार के दस्तावेज़ पर स्वतः लागू नहीं होती।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह धारणा का अर्थ है कि अभिकर्ता-पत्र को कभी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
तथ्य: यह धारणा प्रत्याख्येय है—जिसके पास वास्तविक साक्ष्य हो कि दस्तावेज़ जाली है या ठीक से प्रमाणीकृत नहीं हुआ, वह अब भी न्यायालय में इसे चुनौती दे सकता है।
मिथक: कोई भी नोटरीकृत दस्तावेज़ अपने-आप यह विशेष धारणा प्राप्त कर लेता है।
तथ्य: यह प्रावधान विशेष रूप से उन दस्तावेज़ों पर लागू होता है जो अभिकर्ता-पत्र (power of attorney) होने का दावा करते हैं और जिनका प्रमाणीकरण सूचीबद्ध प्राधिकारियों—नोटरी, न्यायालय, न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट, वाणिज्य दूत या केंद्र सरकार के प्रतिनिधि—द्वारा हुआ हो; यह हर नोटरीकृत कागज़ पर स्वतः लागू नहीं होता।