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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 24

Consideration of proved confession affecting person making it and others jointly under trial

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (धारा 30) के दीर्घकालिक नियम को ही आधुनिक संदर्भ-संदर्भण के साथ भारतीयह साक्ष्य अधिनियम, 2023 में आगे बढ़ाता है (जैसे भगोड़े अभियुक्त को BNSS की उद्घोषणा प्रक्रिया से जोड़ना)। इसका कारण यह है कि भारत में संयुक्त मुकदमे सामान्य हैं और एक अभियुक्त के इक़रार में प्रायः अन्य का भी नाम आता है। चूँकि इक़रार शपथ पर दिया गया बयान नहीं होता और उस पर जिरह नहीं की जा सकती, क़ानून इसे स्वयं में प्रमाण नहीं, बल्कि सहायक, कमज़ोर साक्ष्य मानता है—जिससे न्यायालयों को लचीलापन मिलता है, साथ ही ऐसे सह-अभियुक्तों के विरुद्ध अनुचित उपयोग से बचाव भी होता है जिन्होंने कथन किया ही नहीं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने लम्बे समय से माना है कि सह-अभियुक्त का इक़रार साक्ष्य अधिनियम की परिभाषा के कठोर अर्थ में ‘साक्ष्य’ नहीं है और अपने बल पर अकेले दोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं बन सकता; इसे केवल अभिलेख पर विद्यमान अन्य स्वायत्त साक्ष्यों को आश्वस्ति देने के लिए ही प्रयोग किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने (उदा., Kashmira Singh v. State of Punjab की तर्क-रेखा का अनुसरण करने वाले मामलों में) बल दिया है कि ऐसा इक़रार साक्ष्य का सबसे कमज़ोर प्रकार है और सह-अभियुक्त के विरुद्ध दोष ठहराने से पहले अन्य सामग्री द्वारा इसका पुष्टिकरण आवश्यक है। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि इक़रार वास्तविक होना चाहिए—अर्थात अपने करने वाले के ही प्रतिकूल होना चाहिए—और इस प्रावधान के लागू होने के लिए मुकदमा सचमुच संयुक्त होना चाहिए, जैसा कि दृष्टांत (b) से स्पष्ट है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि केवल सह-अभियुक्त का इक़रार ही दूसरे अभियुक्त को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त है।

    तथ्य: न्यायालयों ने कहा है कि ऐसा इक़रार कमज़ोर साक्ष्य है और वह केवल अन्य स्वतन्त्र साक्ष्यों को सहारा दे सकता है—वह सह-अभियुक्त की दोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं बन सकता।

  • मिथक: यह नियम तब भी लागू होता है जब दूसरा व्यक्ति उसी मामले में मुकदमे का सामना नहीं कर रहा हो।

    तथ्य: जैसा कि दृष्टांत (b) दिखाता है, यदि वह व्यक्ति संयुक्त रूप से अभियुक्त नहीं है, तो उसके इक़रार का उपयोग किसी अलग मुकदमे में दूसरे अभियुक्त के विरुद्ध नहीं किया जा सकता।