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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 23

Confession to police officer

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम इसलिए है क्योंकि इतिहास में पुलिस अभिरक्षा में अक्सर दबाव, धमकी या यातना देकर स्वीकारोक्तियाँ कराई गई हैं। औपनिवेशिक दौर के कानून-निर्माताओं और बाद के भारतीय विधायकों ने माना कि पुलिस दबाव में की गई स्वीकारोक्ति अविश्वसनीय होती है और व्यक्ति की गरिमा तथा आत्मअभियोग के विरुद्ध संरक्षण के अधिकार का उल्लंघन करती है। मजिस्ट्रेट की उपस्थिति अनिवार्य करने से कानून एक तटस्थ, निर्भय वातावरण सुनिश्चित करता है, जहाँ व्यक्ति बिना डर के स्वेच्छा से स्वीकार कर सके। यह प्रावधान भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की दीर्घकालिक सिद्धि को आगे बढ़ाते हुए भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Bharatiya Sakshya Adhiniyam), 2023 में भी विद्यमान है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों, जिनमें सर्वोच्च न्यायालय भी शामिल है, ने बार-बार माना है कि यह सुरक्षा हिरासत में होने वाले दुव्यवहार और यातना को रोकने के लिए अनिवार्य है। मामलों ने स्पष्ट किया है कि ‘खोज’ वाला अपवाद संकीर्ण है — केवल वही सटीक सूचना जो सीधे किसी भौतिक खोज (जैसे छिपाए गए हथियार का स्थान) तक ले जाए, प्रयोज्य है, पूरी स्वीकारोक्ति नहीं। अदालतें सख्त रही हैं कि केवल पुलिस द्वारा, बिना मजिस्ट्रेट की भागीदारी के दर्ज की गई कोई भी स्वीकारोक्ति ग्राह्य नहीं है, जिससे जबरन इक़रारों के विरुद्ध संरक्षण मज़बूत होता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: पुलिस के समक्ष की गई कोई भी स्वीकारोक्ति, यदि सत्य हो, तो उसे अदालत में इस्तेमाल किया जा सकता है।

    तथ्य: भले ही स्वीकारोक्ति सच हो, यदि वह सीधे पुलिस के सामने (बिना मजिस्ट्रेट की उपस्थिति के) की गई है, तो उसे साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि कानून मानता है कि ऐसी स्वीकारोक्तियाँ दबाव में कराई गई हो सकती हैं।

  • मिथक: यदि पुलिस आपकी स्वीकारोक्ति के आधार पर साक्ष्य ढूँढ़ ले, तो पूरी स्वीकारोक्ति ग्राह्य हो जाती है।

    तथ्य: केवल कथन का वही विशिष्ट अंश प्रयोज्य है जिसने सीधे किसी तथ्य की खोज तक पहुँचाया — पूरी स्वीकारोक्ति नहीं।