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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 22

Confession caused by inducement, threat, coercion or promise, when irrelevant in criminal

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम दीर्घकालीन साक्ष्य-कानून के सिद्धान्तों से निकला है (मूलतः भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 24; अब भाराभिया साक्ष्य अधिनियम, 2023 में पुनर्निधारित), जिसका उद्देश्य पुलिस व अन्य प्राधिकारियों द्वारा डर, बल या झूठे वादों से इक़रार उगलवाने की प्रवृत्ति को रोकना है। विचार यह है कि इक़रार आरोपित की स्वतन्त्र, सच्ची वाणी हो—न कि दबाव में निकले शब्द—क्योंकि ज़बरदस्ती के इक़रार अविश्वसनीय व अन्यायपूर्ण होते हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने इसके समान पूर्ववर्ती प्रावधान (साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 24) की व्याख्या करते हुए लगातार कहा है कि कसौटी यह है: इक़रार के समय आरोपित के पास यह युक्तियुक्त आधार था या नहीं कि इक़रार करने से उसे कोई लौकिक लाभ मिलेगा या हानि से बच सकेगा—मूल प्रश्न यह नहीं कि वास्तव में प्रलोभन हुआ, बल्कि यह कि वह बात आरोपित के मन को ऐसी प्रतीत हुई या नहीं। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि साधारण पूछताछ, या वह इक़रार जो तब किया गया हो जब कोई दबाव साफ़ तौर पर समाप्त हो चुका हो, निषिद्ध नहीं है; और केवल चाल, गोपनीयता का वादा, या औपचारिक चेतावनी का अभाव—इनसे मात्र से इक़रार दूषित नहीं हो जाता।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: कोई भी इक़रार इस वजह से स्वतः ही अमान्य हो जाता है कि व्यक्ति को औपचारिक चेतावनी—‘बोलना अनिवार्य नहीं’—न दी गई थी।

    तथ्य: क़ानून कहता है कि मात्र चेतावनी का अभाव इक़रार को अप्रासंगिक नहीं बनाता—महत्व यह है कि क्या वास्तविक प्रलोभन, धमकी या ज़बरदस्ती ने उसे जन्म दिया।

  • मिथक: किसी चाल से कराया गया या नशे की हालत में दिया गया हर इक़रार हमेशा के लिए ख़ारिज कर दिया जाता है।

    तथ्य: यह प्रावधान विशेष रूप से कहता है कि केवल छल या केवल नशे की अवस्था—ये अपने-आप, किसी अन्यथा स्वैच्छिक इक़रार को अप्रमाण्य नहीं बनाते।