Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 21
Admissions in civil cases when relevant
In civil cases no admission is relevant, if it is made either upon an express condition that evidence of it is not to be given, or under circumstances from which the Court can infer that the parties agreed together that evidence of it should not be given. Explanation.—Nothing in this section shall be taken to exempt any advocate from giving evidence of any matter of which he may be compelled to give evidence under sub-sections (1) and (2) of section 132.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह नियम ईमानदार और खुली समझौता-वार्ताओं की रक्षा करता है। अगर हर समझौता-प्रस्ताव या वार्ता के दौरान ‘बिना पूर्वाग्रह’ (without prejudice) कहकर की गई हर स्वीकृति बाद में अदालत में व्यक्ति के खिलाफ इस्तेमाल हो सकती, तो लोग अदालत के बाहर विवाद सुलझाने के लिए बेबाकी से कभी न बोलते। भारतीय क़ानून ने यह सिद्धांत अंग्रेजी सामान्य विधि से ग्रहण किया, और इसे भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 23 से यथावत उद्देश्य के साथ भारतीय साक्ष्य अधिनियम (भारतीय साक्ष्य अधिनियम/भरतीय साक्ष्य अधिनियम) नहीं—बल्कि भारत का नया कानून—Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 की धारा 21 में आगे बढ़ाया गया: ईमानदारी को दंडित करने के बजाय समझौते को बढ़ावा देना।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
पूर्ववर्ती साक्ष्य अधिनियम (धारा 23) के तहत न्यायालयों ने लगातार माना कि यह सुरक्षा केवल वास्तविक/सच्ची समझौता-वार्ताओं पर लागू होती है, हर निजी बातचीत पर नहीं। न्यायाधीश देखते हैं कि क्या स्पष्ट रूप से ‘बिना पूर्वाग्रह’ (without prejudice) की शर्त लगी थी या ऐसी परिस्थितियाँ थीं जो दर्शाती थीं कि दोनों पक्ष गोपनीयता चाहते थे। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह सुरक्षा वकील को उन तथ्यों पर गवाही देने से मना करने का अधिकार नहीं देती जिनका खुलासा करना उन्हें अन्यथा क़ानूनन अनिवार्य है (धारा 132 से संबंधित, जो व्यावसायिक संचार को कवर करती है)।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: अदालत के बाहर समझौता-वार्ता के दौरान कही गई कोई भी बात कभी भी किसी भी कानूनी कार्यवाही में इस्तेमाल नहीं की जा सकती।
तथ्य: केवल वे स्वीकृतियाँ संरक्षित हैं जो स्पष्ट या परिस्थितियों से साफ समझ में आने वाली ‘बिना पूर्वाग्रह’ (without prejudice) शर्त के अधीन दी गई हों — आकस्मिक गपशप या असंबंधित बयान अब भी साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल हो सकते हैं।
मिथक: यह नियम वकीलों को अदालत में अपने मुवक्किलों के साथ हुई किसी भी चर्चा से जुड़े प्रश्नों का उत्तर देने से इनकार करने की छूट देता है।
तथ्य: स्पष्टीकरण यह स्पष्ट करता है कि वकीलों को धारा 132(1) और (2) के तहत जिन बातों का खुलासा करना विधिसम्मत रूप से आवश्यक है, उनके बारे में फिर भी गवाही देनी होगी।