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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 85

Presumption as to electronic agreements

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

जैसे-जैसे व्यापार और शासन डिजिटल अनुबंधों की ओर बढ़े, क़ानूनों को वैद्युतिक हस्ताक्षरों को व्यवहार में हस्तलिखित हस्ताक्षरों के समान भरोसे के साथ मानने की आवश्यकता हुई। यह प्रावधान, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 85A (जिसे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 द्वारा जोड़ा गया) से आगे बढ़ाया गया, न्यायालयों को प्रत्येक डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित समझौते के लिए बार‑बार ताज़ा प्रमाण माँगने से बचाता है—इससे ई‑वाणिज्य और डिजिटल प्रशासन में विश्वास बढ़ता है, जबकि साक्ष्य द्वारा इस अनुमान को चुनौती देने की गुंजाइश बनी रहती है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतें सामान्यतः ऐसे अनुमान को प्रत्याख्येय मानती हैं—अर्थात कोई पक्ष साक्ष्य प्रस्तुत कर हस्ताक्षर या समझौते की प्रामाणिकता को चुनौती दे सकता है, जैसे कि धोखाधड़ी, छेड़छाड़, या अधिकार‑विहीनता दिखाकर। सन्निकट साक्ष्य अधिनियम प्रावधान के तहत निर्णयों ने रेखांकित किया है कि यह अनुमान प्रारम्भिक प्रमाण‑भार को स्थानांतरित करता है, पर वैद्युतिक समझौते को अन्तिम रूप से अचैलेंज्य नहीं बनाता।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह प्रावधान यह नहीं कहता कि वैद्युतिक अनुबंध कभी न्यायालय में चुनौती ही नहीं दिए जा सकते।

    तथ्य: अनुमान प्रत्याख्येय है; कोई भी पक्ष साक्ष्य देकर दिखा सकता है कि हस्ताक्षर जाली, दुरुपयोगित, या अमान्य थे।

  • मिथक: किसी ईमेल पर मात्र टाइप किया हुआ नाम या स्कैन किया हुआ हस्ताक्षर इस प्रावधान के अंतर्गत स्वतः सम्मिलित नहीं माना जाता।

    तथ्य: यह धारा विशेषतः विधिक परिभाषित वैद्युतिक या डिजिटल हस्ताक्षरों पर लागू होती है (अक्सर डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र जैसी प्रमाणीकरण तकनीक अपेक्षित होती है), न कि किसी भी अनौपचारिक वैद्युतिक चिह्न पर (सरलीकृत).