Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 83
Presumption as to collections of laws and reports of decisions
The Court shall presume the genuineness of, every book purporting to be printed or published under the authority of the Government of any country, and to contain any of the laws of that country, and of every book purporting to contain reports of decisions of the Courts of such country.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भारत में न्यायालयों को अकसर दूसरे देशों का कानून जानना पड़ता है—जैसे विदेशी अनुबंध, विवाह या उत्तराधिकार के मामलों में। हर विदेशी विधि-पुस्तक की प्रामाणिकता गवाहों या प्रमाणपत्रों से सिद्ध कराना धीमा और कई बार असंभव होता। भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 87 से विरासत में मिली यह व्यवस्था समय बचाती है: यह न्यायालयों को यह मानने देती है कि सरकार द्वारा प्रकाशित आधिकारिक-से दिखने वाले कानून की किताबें और न्यायिक प्रतिवेदन प्रामाणिक हैं; यदि कोई पक्ष इसे चुनौती देना चाहे तो प्रमाण देने का भार उसी पर आ जाता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
पूर्ववर्ती प्रावधान (1872 के अधिनियम की धारा 87) के तहत, भारतीय न्यायालयों ने सामान्यतः माना है कि यह प्रत्याभास केवल उन पुस्तकों पर लागू होता है जो अपने स्वरूप से ही आधिकारिक लगती हैं—जैसे राजपत्र, विधि-संकलन, या मान्यताप्राप्त विधि प्रतिवेदन—और निजी टीकाएँ या अनौपचारिक संकलन इसके दायरे में नहीं आते। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह खंडनीय (रेबटेबल) प्रत्याभास है: यदि कोई पक्ष विश्वसनीय प्रमाण दे दे कि पुस्तक अशुद्ध, पुरानी या प्राधिकारहीन है, तो यह प्रत्याभास हट सकता है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: इस नियम का अर्थ यह नहीं है कि पुस्तक में दिया गया विदेशी कानून स्वतः ही सही और अंतिम है।
तथ्य: यह प्रत्याभास केवल पुस्तक के प्रामाणिक (वास्तव में उसी सरकार द्वारा प्रकाशित) होने के बारे में है; इसके कानूनी आशय को चुनौती से परे नहीं माना जाता—न्यायालय अब भी यह सुन सकते हैं कि कानून की व्याख्या कैसे हो या वह पुराना पड़ चुका है या नहीं।
मिथक: कोई भी पुस्तक जो विदेशी कानून पर चर्चा करने का दावा करे, अपने-आप इस प्रत्याभास के दायरे में आ जाती है—ऐसा नहीं है।
तथ्य: न्यायालयों ने इसे संकीर्ण रूप से पढ़ा है: यह आम तौर पर केवल उन पुस्तकों को कवर करता है जो सरकार के अधिकार से आधिकारिक रूप से मुद्रित या प्रकाशित प्रतीत होती हैं, न कि निजी पाठ्यपुस्तकें या टीकाएँ।