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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 44

Opinion on relationship, when relevant

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

विवाह या पितृत्व जैसी रिश्तेदारियाँ कई बार स्पष्ट दस्तावेज़ों से सिद्ध नहीं होतीं, विशेषकर पारम्परिक या अनौपचारिक परिस्थितियों में। भारतीय साक्ष्य क़ानून (मूलतः Indian Evidence Act, 1872 के अंतर्गत, जिसका अब Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 में पुनर्प्रतिष्ठापन हुआ) ने यह माना था कि समुदाय या परिवार जिस तरह दो लोगों को—पति‑पत्नी या माता‑पिता और संतान—के रूप में बरतता है, वह उस रिश्ते का प्रबल व्यावहारिक साक्ष्य है, क्योंकि परिवार के निकट के लोग प्रायः सच्चाई जानते हैं और उसी अनुसार आचरण करते हैं। साथ ही, एक अपवाद/उपबंध इसलिए जोड़ा गया कि इस नरम, आचरण‑आधारित साक्ष्य का दुरुपयोग तलाक़ या द्विविवाह जैसे गम्भीर मामलों में विवाह सिद्ध करने हेतु न हो, जहाँ वैध विवाह के कड़े प्रमाण अपेक्षित होते हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने लम्बे समय से ‘प्रतिष्ठा (प्रतिष्ठान) और आचरण’ वाले साक्ष्य—जैसे कि किसी दम्पति को रिश्तेदारों और समाज द्वारा पति‑पत्नी के रूप में माना और बरता जाना—को सामान्य दीवानी विवादों (जैसे उत्तराधिकार या भरण‑पोषण) में विवाह सिद्ध करने हेतु प्रासंगिक माना है, जो पुराने Indian Evidence Act, 1872 की धारा 50 के तर्क का अनुसरण करता है। किन्तु न्यायालय लगातार यह भी मानते आए हैं कि केवल ऐसा साक्ष्य अपने‑आप में वैध विवाह सिद्ध करने के लिए वैवाहिक कार्यवाहियों या द्विविवाह के आपराधिक अभियोगों में पर्याप्त नहीं है, जहाँ वैध विवाह की विशेष विधियों और वैधानिक आवश्यकताओं का कड़ाई से सिद्ध होना जरूरी है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यदि परिवार और मित्र हमेशा किसी जोड़े को विवाहित मानते रहे हों, तो मात्र यही तथ्य किसी भी मामले—यहाँ तक कि तलाक़ या द्विविवाह—में भी विवाह को विधिक रूप से सिद्ध कर देता है।

    तथ्य: विधि का यह प्रावधान स्वयं कहता है कि प्रतिष्ठा‑आधारित यह साक्ष्य Divorce Act की कार्यवाहियों में या Bharatiya Nyaya Sanhita की धाराएँ 82 और 84 के अंतर्गत द्विविवाह/अमान्य‑विवाह के अभियोजनों में विवाह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है—वहाँ कठोर प्रमाण अपेक्षित हैं।

  • मिथक: यह धारा केवल विवाह पर ही लागू होती है।

    तथ्य: यह व्यापक रूप से किसी भी रिश्ते के प्रश्न पर लागू होती है, जिनका न्यायालय को निर्णय करना हो—जैसे पितृत्व या वैधता—जिसे पुत्र की वैधता सम्बन्धी उदाहरण (चित्रण (b)) से स्पष्ट किया गया है।