Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 45
Grounds of opinion, when relevant
Whenever the opinion of any living person is relevant, the grounds on which such opinion is based are also relevant.
Illustration. An expert may give an account of experiments performed by him for the purpose of forming his opinion. Character when relevant
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
अदालतें अक्सर अन्य प्रावधानों के तहत विशेषज्ञ साक्ष्य पर (जैसे चिकित्सक, वैज्ञानिक, हस्तलिपि परीक्षक आदि की) राय पर निर्भर रहती हैं। पर केवल राय, यह जाने बिना कि वह कैसे बनी, न तो आसानी से विश्वसनीय मानी जा सकती है और न ही प्रभावी ढंग से चुनौती दी जा सकती है। यह प्रावधान, जो Indian Evidence Act, 1872 की Section 51 से ग्रहण किया गया है (19वीं शताब्दी की ब्रिटिश-भारतीय विधि-रचना और कॉमन लॉ [common law] के प्रभाव से आकार लिया हुआ कानून), सुनिश्चित करता है कि किसी राय के पीछे का तर्क, आँकड़े/डेटा और विधियाँ जाँच-परख के लिए खुली रहें, ताकि अदालत और विपक्षी पक्ष राय की विश्वसनीयता की जाँच कर सकें, न कि उसे आँख बंद करके मान लें।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
पूर्ववर्ती प्रावधान (Evidence Act, 1872 की Section 51) के अधीन, भारतीय अदालतों ने लगातार माना है कि यदि आधारभूत डेटा, पद्धति और तर्क उजागर न किए जाएँ और परखे न जा सकें, तो विशेषज्ञ की केवल नंगी राय का महत्व बहुत कम होता है। अदालतों ने इसी सिद्धांत के आधार पर विशेषज्ञों की उनकी विधियों पर जिरह (क्रॉस-एग्ज़ामिनेशन) की अनुमति दी है, और जहाँ विशेषज्ञ अपने निष्कर्ष का आधार समझा या प्रमाणित नहीं कर पाए, वहाँ ऐसी राय का महत्व घटाया है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: किसी विशेषज्ञ की राय केवल इसलिए स्वीकार की जानी चाहिए क्योंकि वह विशेषज्ञ है।
तथ्य: अदालतें विशेषज्ञ राय के पीछे की तर्क-प्रक्रिया और साक्ष्यों की जाँच कर सकती हैं और करती हैं; मात्र राय अपने-आप में अंतिम या निर्णायक नहीं होती।
मिथक: यह धारा केवल वैज्ञानिक विशेषज्ञों पर लागू होती है।
तथ्य: यह तब लागू होती है जब भी किसी भी जीवित व्यक्ति की राय कानून के अधीन प्रासंगिक हो — न कि केवल वैज्ञानिक या तकनीकी विशेषज्ञों तक सीमित।