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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 46

In civil cases character to prove conduct imputed, irrelevant

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह नियम भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 52 को नए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023) में आगे बढ़ाता है। दीवानी मामलों का निर्णय विवाद के ठोस तथ्यों — अनुबंध, लेन-देन, दस्तावेज़, प्रासंगिक समय का आचरण — पर होना चाहिए, न कि इस पर कि कोई व्यक्ति सामान्यतः ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ है। चरित्र-साक्ष्य को खुलकर स्वीकार करने से मुकदमे चरित्र-हनन या प्रतिष्ठा की होड़ में बदल सकते हैं, वास्तविक मुद्दे से ध्यान भटक सकता है, और उस पक्ष के विरुद्ध अन्यायपूर्ण पक्षपात का जोखिम बन सकता है जिसकी छवि खराब हो पर इस मामले में उसने कुछ गलत न किया हो।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने सामान्यतः इसे एक संकीर्ण बहिष्करण नियम की तरह माना है: दीवानी मुकदमों में चरित्र-साक्ष्य बाहर रखा जाता है, जब तक कि वह उन तथ्यों से स्वाभाविक रूप से न उभरे जो पहले से ही प्रासंगिक हैं (उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति की आदतन बेईमानी का प्रमाण तब स्वीकार हो सकता है जब वह किसी प्रासंगिक लेन-देन को सिद्ध करने का अंग हो, न कि केवल उसे बदनाम करने के लिए)। भारतीय न्यायालयों ने लगातार इस कड़े दीवानी-नियम को उन अधिक लचीली व्यवस्थाओं से अलग बताया है जो संबंधित प्रावधानों के तहत आपराधिक मामलों में चरित्र-साक्ष्य को अधिक स्थान देती हैं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: चरित्र-संबंधी साक्ष्य हर प्रकार के न्यायिक मामले में पूरी तरह निषिद्ध है।

    तथ्य: यह नियम विशेष रूप से दीवानी मामलों के लिए है। आपराधिक मामलों में अलग प्रावधान हैं जो चरित्र-साक्ष्य के साथ भिन्न व्यवहार करते हैं, और प्रायः उसे अधिक सीमा तक स्वीकार करते हैं।

  • मिथक: आप दीवानी मामले में कभी भी किसी का चरित्र नहीं बता सकते।

    तथ्य: नियम यह अनुमति देता है कि यदि किसी का चरित्र उन तथ्यों से, जो अपने-आप में प्रासंगिक हैं, स्वाभाविक रूप से प्रकट हो, तो उसे विचार में लिया जा सकता है — इसे केवल तब बाहर रखा जाता है जब उसका उपयोग महज आचरण की संभाव्यता दिखाने के लिए किया जाए।