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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 47

In criminal cases previous good character relevant

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान पुराने Indian Evidence Act, 1872 की Section 53 की धारणा को आगे बढ़ाता है। विचार का आधार मूल न्यायसंगतता का सिद्धांत है: किसी व्यक्ति की जानी‑पहचानी अच्छी प्रतिष्ठा होने से उसके द्वारा आरोपित अपराध करने की संभावना कुछ कम (पर असंभव नहीं) मानी जाती है। English common law ने इसे लंबे समय से स्वीकार किया था, और भारतीय साक्ष्य विधि ने इसे अपनाया ताकि अभियुक्त — जिस पर निर्दोषता सिद्ध करने का कोई दायित्व नहीं होता — समुदाय में अपनी साख को न्यायालय के सामने समग्र तस्वीर के एक हिस्से के रूप में रख सके।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने लगातार माना है कि अच्छे चरित्र का साक्ष्य प्रासंगिक तो है, पर उसकी प्रेरक शक्ति सीमित है — वह दोषसिद्धि के प्रबल, प्रत्यक्ष या विश्वसनीय साक्ष्यों पर हावी नहीं हो सकता। Habeeb Mohammad v. State of Hyderabad (1954) जैसे मामलों में स्पष्ट किया गया कि ऐसे साक्ष्य को अन्य समस्त साक्ष्यों के साथ मिलाकर परखा जाना चाहिए, इसे अलग से कोई स्वतंत्र बचाव नहीं माना जाता। सामान्यतः न्यायाधीश निर्देश देते हैं कि संदेह की स्थिति में अच्छा चरित्र पलड़ा थोड़ा झुका सकता है, पर यदि अन्य साक्ष्य स्पष्ट रूप से अपराध सिद्ध करते हों तो मात्र प्रतिष्ठा के आधार पर बरी नहीं किया जा सकता।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: सिर्फ अच्छे चरित्र का साक्ष्य ही, अन्य किसी भी साक्ष्य की परवाह किए बिना, किसी को बरी करवा सकता है।

    तथ्य: न्यायालय अच्छे चरित्र को केवल एक प्रासंगिक तत्व की तरह मानते हैं; दोष के प्रबल साक्ष्य होने पर, अच्छी प्रतिष्ठा के बावजूद भी दोषसिद्धि हो सकती है।

  • मिथक: इस नियम का मतलब है कि दोषसिद्धि से पहले अभियोजन को पहले अभियुक्त का खराब चरित्र सिद्ध करना होगा।

    तथ्य: यह नियम केवल अभियुक्त को अच्छे चरित्र का साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति देता है; यह अभियोजन पर चरित्र के संबंध में कोई दायित्व नहीं डालता और न ही उसका बोझ स्थानांतरित करता है।