Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 74
Public and private documents
(1) The following documents are public documents:—
(a) documents forming the acts, or records of the acts—
(i) of the sovereign authority;
(ii) of official bodies and tribunals; and
(iii) of public officers, legislative, judicial and executive of India or of a foreign country;
(b) public records kept in any State or Union territory of private documents.
(2) All other documents except the documents referred to in sub-section (1) are private.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
न्यायालयों को किसी दस्तावेज़ पर भरोसा करने से पहले यह परखने का विश्वसनीय तरीका चाहिए कि वह असली है या नहीं। सरकारी निकायों, न्यायालयों और अधिकारियों द्वारा बनाए या संरक्षित दस्तावेज़ आम तौर पर अधिक विश्वसनीय माने जाते हैं, क्योंकि वे सार्वजनिक दायित्व और आधिकारिक निगरानी में बनते हैं; इसलिए क़ानून उन्हें अपेक्षाकृत सरल तरीक़े से सिद्ध करने देता है (जैसे प्रमाणित प्रतियों से), हर बार मूल दस्तावेज़ या साक्षी बुलाने की ज़रूरत नहीं होती। यह प्रावधान — जो पुराने Indian Evidence Act, 1872 की धारा 74 से अधिकतर अपरिवर्तित रूप में आया है — ‘सार्वजनिक’ और ‘निजी’ दस्तावेज़ों के बीच वही रेखा खींचता है ताकि अन्य साक्ष्य-नियम (जैसे प्रत्येक प्रकार को कैसे सिद्ध किया जाए) ठीक से लागू हो सकें।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों ने, 1872 वाले Evidence Act के इसी समान प्रावधान की व्याख्या करते हुए, कहा है कि मात्र किसी सरकारी दफ़्तर की अभिरक्षा में होना अपने-आप किसी दस्तावेज़ को ‘सार्वजनिक’ नहीं बना देता — उसे सूचीबद्ध विशिष्ट श्रेणियों में आना चाहिए, जैसे किसी आधिकारिक कृत्य का अभिलेख होना या ऐसा निजी दस्तावेज़ होना जिसे राज्य के अभिलेख में रखना अनिवार्य है (जैसे Registration Act के तहत पंजीकृत दस्तावेज़)। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि विदेशी लोक अधिकारियों से आए दस्तावेज़ भी इसके दायरे में हैं, परंतु प्रमाण के उद्देश्य से उनके साथ अतिरिक्त प्रमाणीकरण जैसे अन्य साक्ष्यता-नियमों की शर्तें लागू हो सकती हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: कोई भी दस्तावेज़ जो सरकारी दफ़्तर में रखा है, ‘सार्वजनिक दस्तावेज़’ बन जाता है।
तथ्य: केवल वे दस्तावेज़, जो सरकार, अधिकरणों या लोक अधिकारियों के कृत्यों के आधिकारिक अभिलेख हैं — या वे निजी दस्तावेज़ जिन्हें राज्य को विशेष रूप से अभिलेख में रखना अनिवार्य है (जैसे पंजीकृत विलेख) — ही इस धारा के तहत सार्वजनिक दस्तावेज़ माने जाते हैं।
मिथक: कोई निजी दस्तावेज़ जैसे ही सरकारी दफ़्तर के संपर्क में आता है, वह सदा के लिए अपना निजी स्वरूप खो देता है।
तथ्य: सार्वजनिक दस्तावेज़ वह आधिकारिक रूप से संरक्षित सार्वजनिक अभिलेख/प्रति बनती है; मूल निजी दस्तावेज़ अपने स्वभाव से निजी ही बना रहता है।