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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 75

Certified copies of public documents

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (Section 76) में पहली बार संहिताबद्ध नियम को आगे बढ़ाता है, जिसे लगभग यथावत भारतिया साक्ष्य अधिनियम, 2023 में समाहित किया गया है। लोक अभिलेख—भूमि रजिस्टर, न्यायालय आदेश, जन्म प्रमाणपत्र, सरकारी अधिसूचनाएं—अक्सर विवादों में प्रमाण के रूप में आवश्यक होते हैं, पर मूल अभिलेख हर अदालत में न दिया जा सकता है, न जोखिम में डाला जा सकता है। इसलिए कानून उचित रूप से अभिरक्षक अधिकारी द्वारा प्रमाणीकरण होने पर प्रमाणित प्रतियों को मूल के स्थानापन्न के रूप में स्वीकार करता है, जिससे विश्वसनीयता बनी रहती है और मूल अभिलेख सुरक्षित रहता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने लंबे समय से माना है कि इस प्रावधान के तहत (और साक्ष्य अधिनियम की पूर्ववर्ती Section 76 के अंतर्गत) ‘प्रमाणित प्रति’ मूल प्रस्तुत किए बिना भी दस्तावेज़ की सामग्री का गौण साक्ष्य मानी जाती है, बशर्ते प्रमाणित करने वाले अधिकारी के पास वास्तविक अभिरक्षा रही हो और निर्धारित प्रारूप—हस्ताक्षर, दिनांक, आधिकारिक पदनाम, और जहां लागू हो वहां मुहर—का पालन किया गया हो। निर्णयों ने यह भी रेखांकित किया है कि प्रमाणन में त्रुटियां (जैसे मुहर का अभाव या अनुचित अधिकारी द्वारा प्रमाणन) साक्ष्यमूल्य को प्रभावित कर सकती हैं, तथा यह कि ‘निरीक्षण का अधिकार’ वास्तव में किसी अन्य विधि से प्राप्त होना चाहिए, तभी इस धारा के अंतर्गत प्रति देने का दायित्व उत्पन्न होता है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: कोई भी व्यक्ति किसी भी सरकारी दस्तावेज़ की प्रमाणित प्रति मांग सकता है।

    तथ्य: कानून तभी यह दायित्व लगाता है जब उस व्यक्ति के पास किसी अन्य विधि या नियम के तहत उस विशिष्ट दस्तावेज़ का वैधानिक निरीक्षण-अधिकार पहले से मौजूद हो।

  • मिथक: सरकारी कार्यालय से मिली कोई भी फोटोकॉपी अपने-आप ‘प्रमाणित प्रति’ होती है।

    तथ्य: यह तभी प्रमाणित प्रति बनती है जब अधिकृत अधिकारी इस धारा के अनुसार दिनांकित प्रमाण-पत्र, हस्ताक्षर, आधिकारिक पदनाम और (जहां लागू हो) मुहर जोड़ देता है।