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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 73

Proof as to verification of digital signature

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

जैसे-जैसे भारत डिजिटल लेन-देन और इलेक्ट्रॉनिक अभिलेखों की ओर बढ़ा, कानूनों में ऐसी व्यवस्था की जरूरत पड़ी जो डिजिटल हस्ताक्षरों का सत्यापन वैसा ही करे जैसा भौतिक हस्ताक्षरों के लिए हस्तलिखित लिखावट या उंगलियों के निशान का किया जाता है। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 द्वारा संशोधित पुराने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 73 की भावना को आगे बढ़ाते हुए यह प्रावधान न्यायालयों को तकनीकी तथा संस्थागत साधनों से डिजिटल हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता निश्चित करने की सुसंगठित पद्धति देता है, ताकि विधिक कार्यवाही में डिजिटल साक्ष्य पर भरोसा किया जा सके।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना गलत है कि डिजिटल हस्ताक्षरों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती क्योंकि वे ‘तकनीकी’ हैं और अपने-आप भरोसेमंद माने जाते हैं।

    तथ्य: जब प्रामाणिकता पर संदेह हो, तो न्यायालय इस प्रावधान का उपयोग करके डिजिटल हस्ताक्षरों का सत्यापन करते हैं और कर सकते हैं।

  • मिथक: केवल वही व्यक्ति जिसने हस्ताक्षर किया है, यह सिद्ध कर सकता है कि उसका डिजिटल हस्ताक्षर असली है — यह धारणा सही नहीं है।

    तथ्य: कानून नियंत्रकों (Controller), प्रमाणन प्राधिकारियों (Certifying Authorities) या स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञों को भी हस्ताक्षर का सत्यापन करने की अनुमति देता है।