Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023
धारा 67
Proof of execution of document required by law to be attested
If a document is required by law to be attested, it shall not be used as evidence until one attesting witness at least has been called for the purpose of proving its execution, if there be an attesting witness alive, and subject to the process of the Court and capable of giving evidence: Provided that it shall not be necessary to call an attesting witness in proof of the execution of any document, not being a will, which has been registered in accordance with the provisions of the Indian Registration Act, 1908 (16 of 1908), unless its execution by the person by whom it purports to have been executed is specifically denied.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ों (विशेषकर वसीयत) के लिए अटेस्टेशन की शर्तें धोखाधड़ी और जालसाज़ी रोकने हेतु रखी गई हैं, क्योंकि दस्तावेज़ बनाने वाला व्यक्ति स्वयं पुष्टि करने के लिए मृत या अनुपलब्ध हो सकता है। Indian Evidence Act, 1872 की धारा 68 से आगे लाई गई यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि ये सुरक्षा उपाय केवल काग़ज़ी औपचारिकता न रहें—अदालत में कोई व्यक्ति आकर यह सत्यापित करे कि हस्ताक्षर की प्रक्रिया विधिवत् पूरी हुई थी। पंजीयन वाला अपवाद इसलिए जोड़ा गया क्योंकि पंजीयन में स्वयं एक सरकारी अधिकारी द्वारा जाँच शामिल होती है, जिससे गवाह की आवश्यकता कम हो जाती है—पर वसीयत के लिए गवाह का बयान अब भी अनिवार्य माना गया है क्योंकि निर्माता स्वयं गवाही नहीं दे सकता।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
अदालतें लंबे समय से मानती आई हैं कि वसीयत के मामले में वैध निष्पादन सिद्ध करने हेतु कम-से-कम एक अटेस्टिंग गवाह को बुलाना अनिवार्य है, क्योंकि निर्माता का निधन हो चुका होता है (जैसा कि H. Venkatachala Iyengar v. B.N. Thimmajamma जैसे पुराने Evidence Act के अंतर्गत निर्णयों में देखा गया)। अन्य पंजीकृत दस्तावेज़ों के लिए अदालतों ने स्पष्ट किया है कि अपवाद तभी लागू होता है जब निष्पादन को विशेष रूप से विवादित न किया गया हो—यदि स्वयं हस्ताक्षरकर्ता के हस्ताक्षर पर ही आपत्ति हो, तो केवल पंजीयन पर्याप्त नहीं होगा और तब भी गवाह बुलाना पड़ेगा।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: हर पंजीकृत दस्तावेज़ को अदालत में सिद्ध करने के लिए गवाह आवश्यक होता है।
तथ्य: क़ानून पंजीकृत दस्तावेज़ों (वसीयत को छोड़कर) के लिए एक अपवाद बनाता है—जब तक निष्पादन को विशेष रूप से नकारा न जाए, आपको गवाह नहीं बुलाना होता।
मिथक: सिर्फ़ हस्ताक्षरित काग़ज़ दिखाकर वसीयत सिद्ध की जा सकती है।
तथ्य: अदालतों ने माना है कि वसीयतों में सदा अटेस्टिंग गवाह के माध्यम से ही प्रमाण आवश्यक है, क्योंकि पंजीकृत दस्तावेज़ों वाला अपवाद वसीयत पर लागू नहीं होता।
मिथक: यदि सभी अटेस्टिंग गवाह मृत हों या लापता हों, तो दस्तावेज़ कभी साक्ष्य के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता।
तथ्य: यह धारा केवल तब गवाह बुलाने की अपेक्षा रखती है ‘यदि कोई अटेस्टिंग गवाह जीवित हो, और न्यायालय की प्रक्रिया के अधीन होने की स्थिति में हो’; जब ऐसा गवाह उपलब्ध न हो, तो निष्पादन सिद्ध करने के अन्य तरीकों के लिए क़ानून में अलग प्रावधान हैं।