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सं Samvidhan

Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

धारा 65

Proof of signature and handwriting of person alleged to have signed or written document

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

दस्तावेज़ उतने ही विश्वसनीय माने जाते हैं जितना यह सिद्ध हो कि उन्हें वास्तव में उसी व्यक्ति ने बनाया है जिसका दावा किया जा रहा है। यह नियम इसलिए है ताकि न्यायालय केवल नाम दिख जाने या लिखावट मिलती-जुलती लगने भर से दस्तावेज़ को सतही रूप से स्वीकार न कर ले। यह एक बुनियादी साक्ष्यीय दायित्व तय करता है कि लेखन या हस्ताक्षर को साक्ष्य द्वारा स्थापित किया जाए, जिससे कपट, जालसाज़ी और ग़लत आरोप बिना चुनौती के न रह जाएँ।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने पूर्ववर्ती साक्ष्य अधिनियम के समतुल्य प्रावधान (Section 67) के तहत लगातार माना है कि केवल दस्तावेज़ प्रस्तुत कर देना पर्याप्त नहीं है—जिस पक्ष ने उस पर भरोसा किया है, उसे लेखकता सिद्ध करने हेतु साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे (जैसे हस्ताक्षरकर्ता का बयान, हस्ताक्षर होते देखे हुए साक्षी का बयान, या लिखावट की विशेषज्ञ द्वारा तुलना)। न्यायालयों ने विवादित हस्ताक्षरों की स्वीकृत हस्ताक्षरों से तुलना की अनुमति दी है, और विशेषज्ञ मत-साक्ष्य (विशेषज्ञ साक्ष्य से जुड़े प्रावधानों के साथ पढ़कर) को एक तरीक़े के रूप में स्वीकार भी किया है, जबकि यह सावधानी भी बताई है कि मात्र विशेषज्ञ मत विरल ही निर्णायक होता है और उसे अन्य साक्ष्यों के साथ तोलना चाहिए।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यदि किसी दस्तावेज़ पर किसी का नाम या हस्ताक्षर लिखा हो, तो मात्र इतना ही सिद्ध कर देता है कि उसने हस्ताक्षर किए थे।

    तथ्य: क़ानून यह मांग करता है कि वास्तविक प्रमाण—साक्षियों, तुलना या विशेषज्ञ साक्ष्य के माध्यम से—दिया जाए कि हस्ताक्षर या लिखावट उसी व्यक्ति की है; केवल नाम या हस्ताक्षर दिख जाना अपने-आप में प्रमाण नहीं है।

  • मिथक: केवल हस्तलिपि-विशेषज्ञ ही यह सिद्ध कर सकता है कि कोई हस्ताक्षर असली है या नहीं।

    तथ्य: अदालतों ने विभिन्न प्रकार के प्रमाण स्वीकार किए हैं, जिनमें हस्ताक्षर होते देखे हुए प्रत्यक्षदर्शी का बयान और स्वीकृत लिखावट से तुलना शामिल है; केवल विशेषज्ञ मत तक ही प्रमाण सीमित नहीं है।