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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 185

Search by police officer

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

सामान्यतः निजी स्थान की तलाशी के लिए पुलिस को मजिस्ट्रेट का वारंट चाहिए होता है। पर जाँच तात्कालिक हो सकती है—यदि पुलिस वारंट की प्रतीक्षा करे तो साक्ष्य नष्ट या हटाए जा सकते हैं। यह प्रावधान (पुराने CrPC की धारा 165 का आगे बढ़ाया गया रूप) वास्तविक आपात स्थिति में बिना वारंट तलाशी की अनुमति देता है, साथ ही नियंत्रण भी जोड़ता है: पहले से लिखित कारण, तलाशी की वीडियो रिकॉर्डिंग, और बाद में मजिस्ट्रेट को अनिवार्य रिपोर्टिंग। ये सुरक्षा उपाय तेज़ जाँच और मनमानी या दुरुपयोग से सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करते हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पिछले प्रावधान (धारा 165 CrPC) के तहत, न्यायालयों ने लगातार माना कि ये सुरक्षा उपाय वैकल्पिक नहीं, अनिवार्य हैं। सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने कहा है कि तलाशी से पहले कारण दर्ज न करना, या मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट न भेजना, तलाशी को अवैध ठहरा सकता है; हालाँकि इससे प्राप्त साक्ष्य अपने आप अमान्य नहीं हो जाते—न्यायालय देखते हैं कि अनियमितता से अभियुक्त को वास्तविक क्षति हुई या नहीं। न्यायालयों ने यह भी रेखांकित किया है कि ‘युक्तिसंगत आधार’ वास्तविक सूचना पर आधारित होना चाहिए, केवल अंदाज़ा नहीं; और इस शक्ति का प्रयोग सामान्य वारंट प्रक्रिया को नियमित रूप से बाईपास करने के लिए नहीं होना चाहिए।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा पुलिस को जब चाहे बिना वारंट किसी भी घर की तलाशी लेने देती है।

    तथ्य: तलाशी किसी चल रही जाँच से जुड़ी होनी चाहिए, वास्तविक युक्तिसंगत आधार पर टिकी हो, अधिकारी के अपने थाने के क्षेत्र तक सीमित हो, और तलाशी से पहले लिखित कारण दर्ज करना अनिवार्य हो—यह असीमित शक्ति नहीं है।

  • मिथक: क्योंकि वारंट आवश्यक नहीं है, इस तरह की तलाशी पर कोई निगरानी नहीं रहती।

    तथ्य: क़ानून तलाशी की वीडियो रिकॉर्डिंग और 48 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट को अनिवार्य रिपोर्ट करने की माँग करता है, जिससे न्यायालय यह जाँच सकें कि तलाशी उचित थी या नहीं।

  • मिथक: यदि अधिकारी रिकॉर्डिंग या रिपोर्टिंग के चरणों का पालन नहीं करता, तो मिले हुए किसी भी साक्ष्य को स्वतः ही ख़ारिज कर दिया जाता है।

    तथ्य: न्यायालयों ने माना है कि ऐसे प्रावधानों के तहत प्रक्रियागत त्रुटियाँ गंभीर होती हैं और मामले को प्रभावित कर सकती हैं, पर प्रायः वे यह देखते हैं कि क्या वास्तविक हानि पहुँची; आम तौर पर साक्ष्य को स्वतः ही नहीं हटाया जाता।