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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 186

When officer in charge of police station may require another to issue search-warrant

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

सामान्यतः पुलिस का अधिकार-क्षेत्र अपने थाने की स्थानीय सीमाओं तक सीमित रहता है, पर अपराध और साक्ष्य ऐसी सीमाएँ नहीं मानते। यह उपबंध (पुराने दंप्रसं की धारा 166 से आधुनिकीकरण के साथ लिया गया) जाँच अधिकारी को अपने क्षेत्र से बाहर स्थित साक्ष्य तक पहुँचने देता है—या तो स्थानीय थाने के सहयोग से, या आपात स्थिति में सीधे—और साथ ही पर्यवेक्षण के प्रावधान (स्थानीय थाने और मजिस्ट्रेट को सूचना) जोड़ता है ताकि पर-क्षेत्र तलाशी का दुरुपयोग न हो और जवाबदेही बनी रहे।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

समकक्ष दंप्रसं प्रावधान के तहत न्यायालयों ने लगातार माना कि स्थानीय पुलिस और मजिस्ट्रेट को सूचना व अभिलेख भेजने की शर्त आपात तलाशी-शक्ति के दुरुपयोग के विरुद्ध एक सुरक्षा उपाय है, केवल औपचारिकता नहीं; इसका पालन न होने से तलाशी से प्राप्त साक्ष्य के मूल्यांकन पर असर पड़ सकता है, यद्यपि यदि तलाशी अन्यथा निष्पक्ष रही हो तो जब्ती स्वतः अमान्य नहीं मानी जाती थी। न्यायालयों ने यह भी रेखांकित किया कि ‘आपात’ अपवाद वास्तविक, लिखित कारणों पर आधारित होना चाहिए—ऐसे कारण जो यह दर्शाएँ कि साक्ष्य छिपाए या नष्ट किए जा सकते हैं—और सामान्य प्रक्रिया को टालने के लिए इसे नियमित रूप से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: पुलिस जब चाहे बिना किसी को बताए अपने अधिकार-क्षेत्र के बाहर कहीं भी तलाशी कर सकती है।

    तथ्य: यहाँ तक कि आपात स्थितियों में भी कानून तलाशी करने वाले अधिकारी से अपेक्षा करता है कि वह स्थानीय थाने को तुरंत सूचित करे और तलाशी अभिलेख मजिस्ट्रेट को भेजे; प्रभावित व्यक्ति उन अभिलेखों की निःशुल्क प्रति प्राप्त कर सकता है।

  • मिथक: यह उपबंध अलग प्रकार की तलाशी बनाता है और इसके नियम भिन्न हैं।

    तथ्य: वास्तविक तलाशी फिर भी धारा 185 में निर्धारित वही प्रक्रिया अपनाकर की जानी चाहिए; यह उपबंध केवल अधिकार-क्षेत्र और सूचना से सम्बंधित है, कोई भिन्न तलाशी विधि निर्धारित नहीं करता।