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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 187

Procedure when investigation cannot be completed in twenty-four hours

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

अक्सर पुलिस 24 घंटे की प्रारम्भिक गिरफ़्तारी अवधि में जाँच पूरी नहीं कर पाती, पर संविधान न्यायिक निगरानी के बिना अनिश्चितकालीन हिरासत की अनुमति नहीं देता। पुरानी दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 से संशोधनों सहित आगे लाई गई यह व्यवस्था एक मध्य मार्ग बनाती है: यह जाँच जारी रखने देती है, जबकि किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने की अवधि पर मजिस्ट्रेट का नियंत्रण रखती है, और कड़े बाहरी समय-सीमाएँ (60 या 90 दिन) तय करती है, जिनके बाद अभियोग-पत्र बिना दाख़िल हुए निरंतर निरुद्ध रखना अवैध हो जाता है और अभियुक्त ज़मानत का हक़दार होता है। मजिस्ट्रेट की वरिष्ठता, लिखित कारण दर्ज करने और अभियुक्त की भौतिक प्रस्तुति जैसी सुरक्षा-व्यवस्थाएँ, रिमांड का दुरुपयोग कर उत्पीड़न रोकने के लिए बनाई गई थीं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती प्रावधान (धारा 167 CrPC) के तहत न्यायालयों ने बार-बार माना कि 60/90 दिन बाद ‘डिफ़ॉल्ट ज़मानत’ का अधिकार समय-सीमा पार होते ही अभियुक्त का अभिभंग-अधिकार है, केवल विवेकाधीन नहीं (Uday Mohanlal Acharya v. State of Maharashtra)। Supreme Court ने Sanjay Dutt v. State में स्पष्ट किया कि यह अधिकार अभियोग-पत्र दाख़िल होने से पहले माँगा जाना चाहिए — यदि अभियुक्त समय पर ज़मानत के लिए आवेदन नहीं करता/करती, तो अभियोग-पत्र दाख़िल हो जाने पर यह अधिकार खो सकता है। Rakesh Kumar Paul v. State of Assam में न्यायालय ने यह परखा कि 60 दिन या 90 दिन की सीमा किस प्रकार अपराधों का वर्गीकरण करके तय होगी। M. Ravindran v. Intelligence Officer, Customs में पुनः पुष्टि हुई कि डिफ़ॉल्ट ज़मानत अनुच्छेद 21 से प्रवाहित एक मौलिक अधिकार है और न्यायालय इसे कमज़ोर नहीं कर सकते। ये सिद्धान्त नये क्रमांकित धारा 187 BNSS की व्याख्या में भी मार्गदर्शक बने रहने की व्यापक अपेक्षा है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: गलत: यदि जाँच पूरी नहीं हुई तो पुलिस किसी को जितनी देर चाहे हिरासत में रख सकती है।

    तथ्य: क़ानून ने कड़ी बाहरी समय-सीमाएँ तय की हैं — अपराध के अनुसार 60 या 90 दिन — जिनके बाद, भले जाँच पूरी न हुई हो, यदि अभियुक्त ज़मानत प्रस्तुत करता/करती है तो उसे रिहा करना अनिवार्य है।

  • मिथक: न्यायिक अभिरक्षा में भेजे जाने का अर्थ यह नहीं कि अभियुक्त को हर बार शारीरिक रूप से अदालत में हाज़िर होना ही होगा।

    तथ्य: एक बार न्यायिक (पुलिस नहीं) अभिरक्षा में आ जाने पर, मजिस्ट्रेट अभियुक्त के ऑडियो-वीडियो माध्यम से प्रस्तुतिकरण के आधार पर भी हिरासत बढ़ा सकता/सकती है; हर बार प्रत्यक्ष उपस्थिति आवश्यक नहीं।

  • मिथक: गलत: कोई भी मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति को पुलिस अभिरक्षा में भेज सकता/सकती है।

    तथ्य: केवल प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट, या उच्च न्यायालय द्वारा विशेष रूप से सशक्त किए गए द्वितीय श्रेणी के मजिस्ट्रेट, पुलिस अभिरक्षा की अनुमति दे सकते हैं।

  • मिथक: गलत: 60/90 दिन बाद डिफ़ॉल्ट ज़मानत मिलने का मतलब केस ख़त्म हो जाना है।

    तथ्य: डिफ़ॉल्ट ज़मानत केवल अभियुक्त को हिरासत से बाहर करती है; जाँच जारी रह सकती है, और अभियोग-पत्र दाख़िल होने पर अभियुक्त पर मुक़दमा चलकर बाद में दोषसिद्धि भी हो सकती है।