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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 184

Medical examination of victim of rape

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान दण्ड प्रक्रिया संहिता की पुरानी धारा 164A से आया है, जिसे 2013 के आपराधिक विधि संशोधन (2012 की दिल्ली सामूहिक बलात्कार घटना के बाद) के पश्चात जोड़ा गया था, ताकि बलात्कार पीड़िताओं की चिकित्सकीय जाँच की प्रक्रिया मानकीकृत और मानवीय हो। पहले, जाँचें कई बार टलती रहीं, बिना सहमति के हुईं, या अपमानजनक और अविश्वसनीय ‘टू-फिंगर टेस्ट’ से की गईं, जिससे और आघात पहुँचा और साक्ष्य भी अविश्वसनीय रहे। सहमति, त्वरित समय-सीमा, विस्तृत व तर्कसंगत प्रतिवेदन, और शासकीय अस्पताल को प्राथमिकता अनिवार्य करके, यह कानून पीड़िता की गरिमा और अभियोजन में प्रयुक्त न्यायवैज्ञानिक साक्ष्य की शुचिता—दोनों की रक्षा का लक्ष्य रखता है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों, विशेषकर सर्वोच्च न्यायालय ने Lillu v. State of Haryana (2013) में ‘टू-फिंगर टेस्ट’ को असंवैधानिक और अपमानजनक बताया, जिससे स्पष्ट होता है कि सहमति (उपधारा 7) और गरिमा-सम्मान के साथ तर्कयुक्त प्रतिवेदन (उपधारा 3) इस धारा के केन्द्रीय तत्व हैं। न्यायालय बार-बार कह चुके हैं कि इस प्रावधान के अंतर्गत चिकित्सकीय प्रतिवेदन पुष्टिकारक साक्ष्य है, निर्णायक नहीं — यदि पीड़िता का कथन विश्वसनीय है तो अकेले उसी के आधार पर भी दोषसिद्धि हो सकती है, और चिकित्सकीय जाँच का अभाव या विलंब, यदि यथोचित कारण समझाए जाएँ, तो अपने-आप अभियोजन को कमजोर नहीं करता।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: पुलिस या डॉक्टर महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध चिकित्सकीय जाँच के लिए बाध्य कर सकते हैं।

    तथ्य: कानून स्पष्ट रूप से उसकी (या उसके विधिसम्मत प्रतिनिधि की) सहमति अनिवार्य करता है—बिना सहमति जाँच करना बिल्कुल निषिद्ध है।

  • मिथक: अदालत में बलात्कार सिद्ध करने के लिए चिकित्सकीय प्रतिवेदन अनिवार्य है।

    तथ्य: न्यायालयों ने माना है कि विश्वसनीय पीड़िता का बयान अकेले भी दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त हो सकता है; चिकित्सकीय प्रतिवेदन सहायक साक्ष्य है, अनिवार्य प्रमाण नहीं।

  • मिथक: जाँच अस्पताल या पुलिस की सुविधा के अनुसार कभी भी कराई जा सकती है।

    तथ्य: कानून स्पष्ट 24 घंटे की समय-सीमा तय करता है कि घटना की रिपोर्ट के बाद महिला को जाँच हेतु भेजा जाए, ताकि साक्ष्य सुरक्षित रहें और विलंब से होने वाले आघात में कमी आए।