Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 178
Power to hold investigation or preliminary inquiry
The Magistrate, on receiving a report under section 176, may direct an investigation, or, if he thinks fit, at once proceed, or depute any Magistrate subordinate to him to proceed, to hold a preliminary inquiry into, or otherwise to dispose of, the case in the manner provided in this Sanhita.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC, 1973 की धारा 159) की रूपरेखा को आगे बढ़ाता है, जो संज्ञेय अपराध पर पुलिस रिपोर्ट मिलने के बाद मजिस्ट्रेट को लचीलापन देता था। उद्देश्य यह है कि मजिस्ट्रेट पुलिस रिपोर्टिंग पर एक नियंत्रण के रूप में काम कर सके—यह तय करते हुए कि और जांच चाहिए या नहीं, कि क्या एक त्वरित न्यायिक दृष्टि पर्याप्त है, या कोई अन्य प्रक्रिया (जैसे सीधे विचारण या जांच की कार्यवाही) उस मामले के लिए उपयुक्त है। यह शुरुआती चरण में पुलिस कार्रवाई पर न्यायिक पर्यवेक्षण बनाए रखता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
उसी CrPC प्रावधान (धारा 159) के तहत न्यायालयों ने माना कि आगे की जांच कराने या प्रारंभिक पड़ताल करने की मजिस्ट्रेट की शक्ति विवेकाधीन है और इसे मनमाने ढंग से नहीं बल्कि न्यायिक ढंग से प्रयोग करना चाहिए। न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि यह प्रारंभिक स्तर पर एक पर्यवेक्षी/प्रशासनिक शक्ति है, स्वयं में दोषसिद्धि का न्यायिक निर्णय नहीं, और मजिस्ट्रेट को यह तय करने से पहले कि कौन-सा मार्ग अपनाना है, पुलिस रिपोर्ट पर मनन करना चाहिए।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: मजिस्ट्रेट को पुलिस रिपोर्ट जैसी है वैसी ही स्वीकार करनी अनिवार्य है।
तथ्य: मजिस्ट्रेट के पास विवेक है कि वह रिपोर्ट को आगे की जांच के लिए वापस भेजें, स्वयं पड़ताल करें, पड़ताल का दायित्व सौंपें, या कानून जो अनुमति देता है उसके अनुसार अन्य प्रकार से कार्यवाही आगे बढ़ाएँ।
मिथक: इस धारा के अंतर्गत ‘प्रारंभिक पड़ताल’ से दोषी या निर्दोष होने का अंतिम निर्णय हो जाता है।
तथ्य: यह केवल यह तय करने का प्रारंभिक कदम है कि मामला आगे कैसे बढ़े, न कि तथ्यों या दोषसिद्धि पर अंतिम निर्णय।