Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023
धारा 179
Police officer's power to require attendance of witnesses
(1) Any police officer making an investigation under this Chapter may, by order in writing, require the attendance before himself of any person being within the limits of his own or any adjoining station who, from the information given or otherwise, appears to be acquainted with the facts and circumstances of the case; and such person shall attend as so required: Provided that no male person under the age of fifteen years or above the age of sixty years or a woman or a mentally or physically disabled person or a person with acute illness shall be required to attend at any place other than the place in which such person resides: Provided further that if such person is willing to attend at the police station, such person may be permitted so to do.
(2) The State Government may, by rules made in this behalf, provide for the payment by the police officer of the reasonable expenses of every person, attending under sub-section (1) at any place other than his residence.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
यह प्रावधान, संशोधनों सहित, पुराने दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 160 का निरन्तर रूप है। यह दो आवश्यकताओं में संतुलन साधता है: पुलिस को अपराध देखने या उसके बारे में जानने वाले लोगों से शीघ्र जानकारी एकत्र करने में सक्षम होना चाहिए, पर सामान्य नागरिकों को मनमाने ढंग से थानों में न घसीटा जाए—जिसका ऐतिहासिक तौर पर गवाहों को डराने-धमकाने में दुरुपयोग हुआ। समय के साथ संसद ने सुरक्षा उपाय जोड़े—पहले वृद्ध पुरुषों के लिए, फिर महिलाओं के लिए (विशेषकर रात के समय महिलाओं को थानों में बुलाने से छेड़छाड़/अनुचित आचरण के जोखिम को मान्यता देते हुए), और अब भारत न्याय संहिता (BNSS) के तहत इसे दिव्यांग व्यक्तियों तथा तीव्र रोगग्रस्त लोगों तक स्पष्ट रूप से बढ़ाया गया है, तथा पुरुषों की ऊपरी आयु सीमा 65 से घटाकर 60 कर दी गई है। उपधारा (2) में मुआवज़े का प्रावधान इस सिद्धान्त को दर्शाता है कि न्याय में राज्य की सहायता हेतु बुलाए गए आम लोगों पर आर्थिक बोझ नहीं डाला जाना चाहिए।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
पूर्ववर्ती प्रावधान (धारा 160 दंप्रसं) के तहत निचली तथा उच्च न्यायालयों ने बार-बार यह माना कि महिलाओं को थाने में उपस्थित होने को कहने वाली पुलिस सूचनाएँ, उन्हें सुरक्षा देने वाली अनिवार्य प्रावधानिका का उल्लंघन हैं; ऐसे नोटिस रद्द किए गए और निर्देश दिया गया कि महिलाओं के बयान उनके निवास पर ही लिए जाएँ, प्रायः किसी परिजन या महिला अधिकारी की उपस्थिति में। इस न्यायिक प्रवृत्ति ने पुष्ट किया कि यह proviso विवेकाधीन नहीं, बल्कि हिरासत-सदृश ढंग से संवेदनशील गवाहों को तलब करने के विरुद्ध एक बाध्यकारी सुरक्षा है। अपेक्षा है कि BNSS का यह प्रावधान इसी स्थापित व्याख्यात्मक धारा की निरन्तरता में पढ़ा जाएगा, यद्यपि नई संहिता के अंतर्गत विशिष्ट निर्णय अभी विकसित हो रहे हैं।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: सिर्फ लिखित आदेश जारी करके पुलिस किसी को भी जबरन थाने बुला सकती है।
तथ्य: क़ानून कुछ समूहों को विशेष संरक्षण देता है—कम उम्र के लड़के, अधिक उम्र के पुरुष, महिलाएँ, दिव्यांग व्यक्ति, और गम्भीर रूप से बीमार लोग—जिन्हें अपने निवास के अलावा कहीं उपस्थित होने को बाध्य नहीं किया जा सकता।
मिथक: जब पुलिस गवाहों को उनके घर के अलावा कहीं और बुलाती है, तो यात्रा जैसी लागतें हमेशा गवाहों को ही वहन करनी पड़ती हैं।
तथ्य: उपधारा (2) राज्य सरकार को यह नियम बनाने की अनुमति देती है कि पुलिस, निवास-स्थान के अलावा किसी अन्य जगह बुलाए गए गवाहों के युक्तिसंगत खर्चों का भुगतान करे।
मिथक: इस क़ानून के तहत किसी महिला को कभी भी थाने आने के लिए कहा ही नहीं जा सकता।
तथ्य: उसे बाध्य नहीं किया जा सकता; पर यदि वह स्वयं चाहे तो दूसरे उपबंध के अनुसार स्वेच्छा से थाने उपस्थित हो सकती है।