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सं Samvidhan

Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023

धारा 160

Procedure on order being made absolute and consequences of disobedience

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह उपबंध औपनिवेशिक दौर से चली आ रही एक पुरानी प्रक्रिया (दंड प्रक्रिया संहिता से) को आगे बढ़ाता है, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक उपद्रव संबंधी आदेशों—जैसे अवैध अतिक्रमण, सड़कों पर रुकावटें, या खतरनाक ढांचे हटाने के निर्देश—को प्रभावी दांत देना है। प्रवर्तन और लागत-वसूली की व्यवस्था न हो तो ऐसे आदेश अनिश्चितकाल तक नज़रअंदाज़ किए जा सकते थे। उपधारा (3) में निहित सद्भावना-प्रतिरक्षा ईमानदारी से विधिसम्मत जन-सुरक्षा कार्य करते अधिकारियों को उत्पीड़क वादों से बचाती है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

पूर्ववर्ती दं.प्र.सं. के प्रावधान (धारा 141, जो सामग्री रूप से समान है) के अंतर्गत न्यायालयों ने माना है कि नोटिस संबंधी शर्त का कड़ाई से पालन प्रवर्तन से पहले अनिवार्य है, क्योंकि यह व्यक्ति के संपत्ति-अधिकारों को प्रभावित करता है। न्यायालयों ने ‘सद्भावना’ प्रतिरक्षा की व्याख्या भी संकीर्ण रूप में की है—सिर्फ ईमानदारी और उचित सावधानी से किए गए कार्य संरक्षित हैं, मनमाने या द्वेषपूर्ण प्रवर्तन नहीं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: मजिस्ट्रेट बिना किसी स्वीकृति के, क्षेत्र के बाहर भी, किसी भी संपत्ति को कुर्क और नीलाम कर सकता है।

    तथ्य: यदि संपत्ति मजिस्ट्रेट के अधिकार-क्षेत्र से बाहर है, तो उस क्षेत्र के किसी अन्य मजिस्ट्रेट द्वारा पहले कुर्की और नीलामी का अनुमोदन (एंडोर्समेंट) किया जाना आवश्यक है।

  • मिथक: लोग प्रवर्तन कार्रवाई से हुए किसी भी नुकसान के लिए मजिस्ट्रेट पर मुकदमा कर सकते हैं।

    तथ्य: यह क़ानून इस धारा के अधीन सद्भावना (गुड फेथ) में किए गए कार्यों पर मुकदमे की मनाही विशेष रूप से निर्धारित करता है, ताकि ईमानदारी और विधिसम्मत ढंग से काम करने वाले अधिकारियों को सुरक्षा मिल सके।