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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 131

Punishment for assault or criminal force otherwise than on grave provocation

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारतीय दंड संहिता (Section 352) से चली आ रही दीर्घकालिक धारणा को आगे बढ़ाता है—कि साधारण हमला या बल का प्रयोग दंडनीय है, पर कानून को सोचे-समझे आक्रमण और पीड़ित के अपने ही गंभीर उकसावे से उपजी अचानक क्रोधावस्था में हुए कृत्य में भेद करना चाहिए। दुरुपयोग रोकने के लिए स्पष्टीकरण जोड़े गए—जैसे झगड़ा गढ़कर बहाना बनाना, या वैध पुलिस कार्रवाई अथवा किसी की विधिसम्मत आत्मरक्षा पर क्रोधित होना और उसे ‘उकसावा’ बताना।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने, समान शब्दों वाले आईपीसी Section 352 तथा तुलनीय प्रावधानों (जैसे आपराधिक मानव वध में उकसावे का अपवाद, K.M. Nanavati v. State of Maharashtra, 1961 में विवेचित) से विकसित तर्क के आधार पर, माना है कि ‘गंभीर और अचानक उकसावा’ एक वास्तविक (तथ्य-प्रधान) प्रश्न है, जिसे अभियुक्त की निजी संवेदनशीलता के बजाय साधारण समझदार व्यक्ति के मानक से आंका जाता है। न्यायालयों ने लगातार उस स्थिति में उकसावे का बहाना अस्वीकार किया है जहाँ अभियुक्त ने ही टकराव रचा हो, या जहाँ ‘उकसावा’ मात्र पुलिस की वैध कार्यवाही या निजी व्यक्तियों की विधिसम्मत आत्मरक्षा हो।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: कोई भी गाली-गलौज या बहस ‘गंभीर और अचानक उकसावा’ मानी जाती है जो किसी को मारने को माफ़ कर देती है।

    तथ्य: न्यायालय हर मामले के तथ्यों के आधार पर तय करते हैं कि उकसावा सचमुच गंभीर और अचानक था या नहीं; केवल शब्दों की तीखी बोलचाल या छोटे-मोटे झगड़े आमतौर पर पर्याप्त नहीं माने जाते।

  • मिथक: यदि आप इसलिए नाराज़ हुए कि पुलिस ने आपको रोका या किसी ने आपके विरुद्ध आत्मरक्षा की, तो आप उकसावे का दावा कर सकते हैं।

    तथ्य: कानून विशेष रूप से इन परिस्थितियों को बाहर करता है—लोक सेवकों की वैध कार्रवाई या अन्य व्यक्तियों की विधिसम्मत आत्मरक्षा को बहाने के रूप में नहीं लिया जा सकता।

  • मिथक: आप झगड़ा शुरू करें, फिर बदले में उकसाए जाएँ, और बाद में उकसावे का बचाव ले लें—यह मान्य है।

    तथ्य: यदि आप जानबूझकर किसी को भड़काकर हिंसा का बहाना बनाते हैं, तो उकसावे का बचाव आप पर लागू नहीं होगा।