The Constitution of India
अनुच्छेद 143
उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति
उच्चतम न्यायालय से परामर्श करने की राष्ट्रपति की शक्ति— (1) यदि किसी समय राष्ट्रपति को प्रतीत होता है कि विधि या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न हुआ है या उत्पन्न होने की संभावना है, जो ऐसी प्रकृति का और ऐसे व्यापक महत्व का है कि उस पर उच्चतम न्यायालय की राय प्राप्त करना समीचीन है, तो वह उस प्रश्न को विचार करने के लिए उस न्यायालय को निर्देशित कर सकेगा और वह न्यायालय, ऐसी सुनवाई के पश्चात् जो वह ठीक समझता है, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय प्रतिवेदित कर सकेगा । (2) राष्ट्रपति अनुच्छेद 131 2*** के परन्तुक में किसी बात के होते हुए भी, इस प्रकार के विवाद को, जो 3उक्त परन्तुक] में वर्णित है, राय देने के लिए उच्चतम न्यायालय को निर्देशित कर सकेगा और उच्चतम न्यायालय, ऐसी सुनवाई के पश्चात् जो वह ठीक समझता है, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय प्रतिवेदित करेगा ।
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
निर्माताओं ने चाहा था कि कार्यपालिका के पास ऐसा तंत्र हो जिससे वह जटिल या संवेदनशील संवैधानिक/विधिक प्रश्नों पर, बिना वास्तविक वाद की प्रतीक्षा किए, पहले ही अधिकृत मार्गदर्शन ले सके। इससे एक कमी भी पूरी हुई: अनुच्छेद 131 के उपबंध के कारण कुछ पूर्व-संविधान संधि-आधारित विवाद सर्वोच्च न्यायालय के साधारण मूल अधिकार-क्षेत्र से बाहर रहते हैं, इसलिए उपधारा (2) ऐसे विवादों को फिर भी न्यायालय तक पहुँचने देती है—पर इस बार वैकल्पिक नहीं, बल्कि अनिवार्य संदर्भ के रूप में।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
In re Kerala Education Bill (1958) तथा बाद के प्रकरणों में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 143 के अंतर्गत दिया गया परामर्शी मत, अनुच्छेद 141 के सामान्य निर्णय की तरह विधि-निरोधक रूप से बाध्यकारी नहीं होता, यद्यपि उसका प्रबल प्रेरक महत्व होता है। In re Special Courts Bill (1978) और कावेरी जल विवाद संदर्भ (1993) में न्यायालय ने अपनी परामर्शी भूमिका की परिधि स्पष्ट की। विशेष रूप से, अयोध्या-सम्बंधित Ismail Faruqui संदर्भ (In re Ayodhya, 1993) तथा 2G Spectrum Presidential Reference (Special Reference No. 1 of 2012) में न्यायालय ने माना कि यदि प्रश्न शुद्ध रूप से राजनीतिक हो, वास्तविक विधिक सामग्री न रखता हो, या उसके उत्तर के लिए न्यायालय को अपने ही बाध्यकारी निर्णय की पुनर्समीक्षा करनी पड़े, तो वह संदर्भ का उत्तर देने से इन्कार कर सकता है; और यह भी पुष्ट किया कि उपधारा (1) के मत केवल परामर्शी होते हैं, जबकि उपधारा (2) के संदर्भों का उत्तर देना अनिवार्य है।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: जो कुछ भी सर्वोच्च न्यायालय अनुच्छेद 143 के तहत अपने मत में कहे, वह नियमित निर्णय के समान बाध्यकारी विधि होता है।
तथ्य: न्यायालयों ने ठहराया है कि अनुच्छेद 143(1) के अंतर्गत दिए गए मत परामर्शात्मक होते हैं और अनुच्छेद 141 के तहत बाध्यकारी दृष्टांत नहीं बनते, यद्यपि प्रायः उनका प्रबल प्रेरक प्रभाव होता है।
मिथक: सर्वोच्च न्यायालय को राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए हर प्रश्न का हमेशा उत्तर देना ही होता है।
तथ्य: उपधारा (1) में न्यायालय के पास उत्तर न देने का विवेकाधिकार है; केवल उपधारा (2) में, जो विशेषतः अनुच्छेद 131 के उपबंध से जुड़े विवादों तक सीमित है, न्यायालय पर मत देना बाध्यकारी है।