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सं Samvidhan

The Constitution of India

अनुच्छेद 142

उच्चतम न्यायालय की डिक्रियों और आदेशों का प्रवर्तन और प्रकटीकरण आदि के बारे में आदेश

उच्चतम न्यायालय की डिक्रियों और आदेशों का प्रवर्तन और प्रकटीकरण आदि के बारे में आदेश— (1) उच्चतम न्यायालय अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए ऐसी डिक्री पारित कर सकेगा या ऐसा आदेश कर सकेगा जो उसके समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक हो और इस प्रकार पारित डिक्री या किया गया आदेश भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र ऐसी रीति से, जो संसद् द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन विहित की जाए, और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक, ऐसी रीति से जो राष्ट्रपति आदेश761 द्वारा विहित करे, प्रवर्तनीय होगा । (2) संसद् द्वारा इस निमित्त बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उच्चतम न्यायालय को भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र के बारे में किसी व्यक्ति को हाजिर कराने के, किन्हीं दस्तावेजों के प्रकटीकरण या पेश कराने के अथवा अपने किसी अवमान का अन्वेषण करने या दंड देने के प्रयोजन के लिए कोई आदेश करने की समस्त और प्रत्येक शक्ति होगी ।

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

संविधान-निर्माताओं ने चाहा कि सामान्य क़ानून में किसी कमी या कठोर प्रक्रिया के कारण वास्तविक अन्याय के सामने सर्वोच्च न्यायालय असहाय न हो। कॉमन-लॉ प्रणालियों में ‘इक्विटी’ की धारणा से प्रेरित होकर, अनुच्छेद 142 को एक सुरक्षा-वाल्व की तरह रचा गया, जिससे न्यायालय असाधारण मामलों में व्यावहारिक और समग्र उपाय गढ़ सके; और अनुच्छेद 142(2) यह सुनिश्चित करता है कि वह पूरे देश में सहयोग दिलवा सके और अपनी प्राधिकारिता की रक्षा कर सके।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भोपाल गैस त्रासदी के मुकदमे (Union Carbide Corp v. Union of India) में न्यायालय ने अनुच्छेद 142 का उपयोग सामान्य दाय विधि से परे जाकर मुआवज़े का समझौता गढ़ने में किया। Supreme Court Bar Association v. Union of India (1998) में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस शक्ति से स्पष्ट वैधानिक प्रावधानों—जैसे कि कौन वकालत कर सकता है—को निरस्त नहीं किया जा सकता; यह दिखाता है कि ‘पूर्ण न्याय’ की भी सीमाएँ हैं और वह विद्यमान क़ानून के विपरीत नहीं जा सकता। हाल में Shilpa Sailesh v. Varun Sreenivasan (2023) में एक संविधान पीठ ने माना कि न्यायालय उपयुक्त मामलों में परिवार क़ानून की सामान्य प्रतीक्षा अवधि को छोड़े बिना सीधे अनुच्छेद 142 के तहत पारस्परिक सहमति से तलाक़ दे सकता है। अयोध्या शीर्षक विवाद (M. Siddiq, 2019) में भी न्यायालय ने साधारण संपत्ति क़ानून से परे जाकर अंतिम राहत को आकार देने हेतु अनुच्छेद 142 का सहारा लिया, ताकि विवाद का न्यायसंगत समाधान हो सके।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह कहना ग़लत है कि अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को मनचाहा कुछ भी करने देता है और अन्य सभी क़ानूनों को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।

    तथ्य: अदालतों ने ठहराया है (उदा., Supreme Court Bar Association v. Union of India, 1998) कि इस शक्ति से स्पष्ट वैधानिक प्रावधानों या मूल अधिकारों को निरस्त नहीं किया जा सकता; यह कमियों को भरती है और न्यायोचित परिणाम तक पहुँचाती है, पर असीमित अधिकार नहीं देती।

  • मिथक: यह कहना ग़लत है कि अनुच्छेद 142 केवल अदालत की अवमानना से संबंधित है।

    तथ्य: अवमानना और उपस्थिति/दस्तावेज़ प्रस्तुत कराने की शक्ति केवल उपधारा (2) में है; उपधारा (1) की ‘पूर्ण न्याय’ वाली शक्ति कहीं व्यापक है और मुआवज़े, वैवाहिक विवादों तथा जटिल बहुपक्षीय समझौतों जैसे मामलों में प्रयुक्त होती है।