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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 89

repealed

Act done in good faith for benefit of child or insane person, by or by consent of guardian

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान मानता है कि बच्चे और अस्वस्थ-मति व्यक्ति प्रायः चिकित्सकीय उपचार या अन्य आवश्यक हस्तक्षेपों के लिए वैध सहमति नहीं दे पाते, इसलिए कानून उनके पक्ष में अभिभावक को सहमति देने की अनुमति देता है। यह सामान्य-बुद्धि के सिद्धांत को दर्शाता है कि किसी के हित में सद्भावना से किए गए कार्य — जैसे माता-पिता द्वारा बच्चे की शल्य-चिकित्सा के लिए सहमति — सिर्फ इसलिए अपराध न माने जाएँ कि उनमें जोखिम है या सहप्रभाव के रूप में कुछ हानि हुई। यह धारा धारा 88 (स्वयं व्यक्ति द्वारा दी गई सहमति) के साथ मिलकर ऐसे चिकित्सकीय और रक्षात्मक हस्तक्षेपों के लिए पूर्ण ढाँचा बनाती है जहाँ रोगी व्यक्तिगत रूप से सहमति नहीं दे सकता।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने सामान्यतः इस धारा को उसके उपबंधों (जो इस उद्धरण में नहीं हैं) के साथ पढ़ते हुए यह माना है कि संरक्षण उन कृत्यों तक नहीं फैलता जिनका उद्देश्य मृत्यु कारित करना हो, या जिनके बारे में मृत्यु की आशंका का ज्ञान हो — सिवाय उन स्थितियों के जब कृत्य मृत्यु या गंभीर चोट को रोकने, या किसी गंभीर रोग के उपचार के लिए किया गया हो। न्यायालयों ने इसे मुख्यतः नाबालिगों या अस्वस्थ-मति रोगियों से जुड़ी चिकित्सकीय लापरवाही और सहमति के मामलों में लागू किया है, और बल दिया है कि ‘सद्भावना’ का अर्थ वास्तविक देखभाल और सावधानी से है, न कि केवल ईमानदार विश्वास बिना उचित सावधानी के, जैसा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 52 में स्पष्ट किया गया है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा यह अर्थ देती है कि अभिभावक बच्चे या अस्वस्थ-मति व्यक्ति के साथ कुछ भी—यहाँ तक कि मृत्यु का जोखिम—करने की अपरिमित सहमति दे सकते हैं।

    तथ्य: इस धारा के साथ महत्वपूर्ण उपबंध जुड़े हैं (जो इस उद्धरण में शामिल नहीं हैं) जिनके अनुसार मृत्यु कारित करने के इरादे से, या मृत्यु की संभावना का ज्ञान होते हुए किए गए कृत्य, संरक्षण से बाहर हैं — सिवाय उन स्थितियों के जब ऐसा कृत्य मृत्यु या गंभीर चोट को रोकने, या किसी गंभीर रोग के उपचार हेतु किया गया हो। इसलिए यह संरक्षण असीमित नहीं है।

  • मिथक: ‘सद्भावना’ का अर्थ केवल इतना नहीं है कि व्यक्ति को ईमानदारी से लगा कि वह मदद कर रहा है।

    तथ्य: भारतीय दंड संहिता की धारा 52 के अनुसार, ‘सद्भावना’ के लिए उचित सावधानी और ध्यान के साथ कार्य करना आवश्यक है, मात्र ईमानदार नीयत पर्याप्त नहीं — लापरवाही होने पर यह रक्षा विफल हो सकती है।