Indian Penal Code, 1860
धारा 90
repealedConsent known to be given under fear or misconception
A consent is not such a consent as is intended by any section of this Code, if the consent is given by a person under fear of injury, or under a misconception of fact, and if the person doing the act knows, or has reason to believe, that the consent was given in consequence of such fear or misconception; or Consent of insane person if the consent is given by a person who, from unsoundness of mind, or intoxication, is unable to understand the nature and consequence of that to which he gives his consent; or Consent of child unless the contrary appears from the context, if the consent is given by a person who is under twelve years of age.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
भारतीय दंड संहिता में कई बार कोई कृत्य तभी वैध माना जाता है जब प्रभावित व्यक्ति ने उस पर ‘सहमति’ दी हो (जैसे, आहत करने, यौन कृत्यों, या संपत्ति लेने के मामलों में)। धारा 90 का उद्देश्य यह रोकना है कि लोग ऐसी सहमति का कानूनी ढाल के रूप में दुरुपयोग न करें, जब वह सहमति वास्तव में स्वतंत्र या सूचित न हो। यह उस मूल सिद्धांत पर आधारित है कि सच्ची सहमति एक स्वस्थ, स्वतंत्र मन से आती है — न कि धमकी, छल, अपरिपक्वता या अक्षम्यता से घिरे मन से।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
भारतीय न्यायालयों, जिनमें सर्वोच्च न्यायालय भी शामिल है, ने बार‑बार धारा 90 का उपयोग यह परखने के लिए किया है कि क्या सहमति, जैसे विवाह के झूठे वादे पर प्राप्त यौन संबंधों में, या गलत जानकारी दिए गए रोगियों पर किए गए चिकित्सकीय प्रक्रियाओं में, कानूनी रूप से वैध है। निर्णयों ने स्पष्ट किया है कि केवल वादाखिलाफी अपने‑आप ‘तथ्य की गलत धारणा’ नहीं बनती — न्यायालय इस बात के प्रमाण खोजते हैं कि सहमति दिए जाने के समय अभियुक्त का वादा निभाने का कोई इरादा ही नहीं था, और यही धोखा सीधे तौर पर सहमति का कारण बना।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: कोई भी ‘हाँ’ सहमति मानी जाती है, चाहे वह जैसे भी हासिल की गई हो।
तथ्य: धारा 90 के तहत, डर, तथ्यों के बारे में धोखे, अक्षम्यता, या बारह वर्ष से कम आयु के बच्चे द्वारा दी गई ‘हाँ’ को वैध कानूनी सहमति नहीं माना जाता।
मिथक: टूटा हुआ वादा (जैसे विवाह का वादा) हमेशा पहले दी गई सहमति को अमान्य बना देता है।
तथ्य: न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि केवल वही झूठा वादा ‘तथ्य की गलत धारणा’ माना जाएगा जो शुरू से ही निभाने के असली इरादे के बिना किया गया हो — अच्छे विश्वास में किया गया वादा जो बाद में टूट जाए, वह अपने‑आप सहमति को अमान्य नहीं करता।