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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 87

repealed

Act not intended and not known to be likely to cause death or grievous hurt, done by consent

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

धारा 87, भारतीय दण्ड संहिता (IPC) की धाराओं 87-92 के उस समूह का भाग है जो कुछ परिस्थितियों में सहमति को एक वैध प्रतिरक्षा के रूप में मान्यता देता है। कानून स्वीकार करता है कि बहुत-सी रोज़मर्रा और खेलकूद संबंधी गतिविधियों—जैसे शल्य-चिकित्सा, कुश्ती या संपर्क-आधारित खेल—में अंतर्निहित जोखिम होते हैं। यदि वयस्क इन जोखिमों को जान-बूझकर और स्वेच्छा से स्वीकार करते हैं, तो आकस्मिक हानि पहुँचाने वाले को आपराधिक दंड नहीं मिलना चाहिए, बशर्ते मृत्यु या गंभीर चोट पहुँचाने का इरादा या ज्ञात संभावना कभी न रही हो। यह व्यक्तिगत स्वायत्तता के सम्मान को दर्शाता है: लोग अपने शरीर से जुड़े कुछ जोखिमों के लिए सहमति दे सकते हैं।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

भारतीय न्यायालयों ने धारा 87 का प्रयोग मुख्यतः खेल-चोटों, शल्य-क्रियाओं, और ऐसे कठोर खेल या चंचल कृत्यों में किया है जहाँ गंभीर हानि का इरादा न होते हुए भी चोट लग जाती है। न्यायालयों ने रेखांकित किया है कि सहमति स्वैच्छिक, सूचित और विधि के अनुसार सक्षम व्यक्ति द्वारा दी जानी चाहिए (इसीलिए 18 वर्ष की आयु-सीमा)। इस धारा को अक्सर धारा 88 और 89 के साथ पढ़ा गया है, जो किसी के हित में सद्भावना से किए गए कृत्यों तथा बच्चों या मानसिक रूप से असमर्थ व्यक्तियों से संबंधित कृत्यों को समान सुरक्षा प्रदान करती हैं। न्यायिक व्याख्या ने स्पष्ट किया है कि धारा 87 के अंतर्गत सहमति उन कृत्यों तक नहीं फैली है जिनका उद्देश्य मृत्यु या गंभीर चोट पहुँचाना है, या जहाँ ऐसे परिणामों की संभावना ज्ञात हो—यह सुरक्षा सीमित है और लापरवाह या जानबूझकर किए गए गंभीर नुकसान को नहीं ढँकती।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: धारा 87 का मतलब है कि आप किसी भी बात के लिए सहमति दे सकते हैं, यहाँ तक कि गंभीर रूप से घायल होने या मारे जाने के लिए भी।

    तथ्य: यह धारा विशेष रूप से उन कृत्यों को बाहर रखती है जिनका उद्देश्य मृत्यु या गंभीर चोट पहुँचाना हो, या जिनसे मृत्यु या गंभीर चोट होने की संभावना ज्ञात हो—ऐसी स्थितियों में सहमति मान्य नहीं होती।

  • मिथक: यह धारा किसी भी उम्र के लोगों पर लागू होती है।

    तथ्य: यह सुरक्षा केवल तब लागू होती है जब हानि उठाने वाला व्यक्ति अठारह वर्ष से अधिक आयु का हो।

  • मिथक: निहित सहमति मान्य नहीं है—केवल लिखित या मौखिक सहमति ही गिनी जाती है।

    तथ्य: क़ानून स्पष्ट रूप से व्यक्त (मौखिक/लिखित) और निहित सहमति—जो आचरण या परिस्थितियों से व्यक्त हो—दोनों को मान्यता देता है।