Indian Penal Code, 1860
धारा 362
repealedAbduction
Whoever by force compels, or by any deceitful means induces any person to go from any place, is said to abduct that person.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
अपहरण को व्यापक रूप से एक कृत्य के रूप में परिभाषित किया गया है; यह अपने आप में स्वतंत्र अपराध नहीं है, ताकि बाद की धाराओं में बताए गए विशिष्ट अभिप्रायों (जैसे हत्या का अभिप्राय, जबरन विवाह का अभिप्राय, या अवैध निरोध का अभिप्राय) के साथ जोड़कर अलग और अधिक गंभीर अपराध बनाए जा सकें। इस संरचना से विधि को उसी आचरण को उसके निहित कुटिल उद्देश्य के अनुसार भिन्न‑भिन्न रूप से दंडित करने की सुविधा मिलती है। Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 भी अपहरण को इसी प्रकार एक ऐसा कृत्य मानती है जो दंडनीय बनने के लिए आगे की आपराधिक मंशा की माँग करता है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
न्यायालय निरंतर मानते आए हैं कि अकेला अपहरण दंडनीय अपराध नहीं है; यह तभी अपराध बनता है जब इसे धारा 364, 365 या 366 जैसी धाराओं में वर्णित किसी विशिष्ट कुटिल मंशा के साथ जोड़ा जाए। न्यायालय यह देखते हैं कि कृत्य (बल या धोखा) हुआ या नहीं, और क्या आगे का कोई कुटिल उद्देश्य मौजूद था।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: यह कहना गलत है कि अपहरण हमेशा एक स्वतंत्र अपराध है जिसका अपना तयशुदा दंड होता है।
तथ्य: स्वतः अपहरण केवल कृत्य का वर्णन है; यह तभी दंडनीय अपराध बनता है जब इसे अन्य धाराओं में परिभाषित किसी विशिष्ट कुटिल मंशा के साथ जोड़ा जाए।