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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 361

repealed

Kidnapping from lawful guardianship

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान बच्चों और संवेदनशील व्यक्तियों को उन लोगों की देखरेख और सुरक्षा से हटाए जाने से बचाता है जो उनके लिए विधिक रूप से उत्तरदायी हैं, यह मानते हुए कि अवयस्क और अस्वस्थ मस्तिष्क वाले व्यक्ति हमेशा अपने हितों की रक्षा नहीं कर सकते या सार्थक सहमति नहीं दे सकते। भारतीय दंड संहिता के स्थान पर आए Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 में भी विधिसम्मत अभिभावकत्व से अपहरण के समकक्ष प्रावधान को जारी रखा गया है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतों ने स्पष्ट किया है कि यदि अवयस्क स्वयं साथ चला भी जाए या उसे ‘फुसलाया’ गया हो और बल प्रयोग न हुआ हो, तब भी यदि अभिभावक की सहमति नहीं है तो यह अपहरण ही माना जाएगा; अवयस्क की अपनी सहमति विधिक रूप से अप्रासंगिक है। अदालतें यह भी परखती हैं कि आरोपी को यह पता था या युक्तिसंगत आधार था मानने का कि वह व्यक्ति अवयस्क है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यदि अवयस्क अपनी मर्ज़ी से चला गया हो, तो यह अपहरण नहीं है।

    तथ्य: इस धारा के अंतर्गत अवयस्क की सहमति का कोई महत्व नहीं; निर्णायक यह है कि विधिक अभिभावक ने सहमति दी या नहीं, और यदि सहमति नहीं थी, तो यह अपहरण है।