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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 321

repealed

Voluntarily causing hurt

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह धारा मानसिक तत्व (उद्देश्य या ज्ञान) को वास्तविक परिणति (आघात) के साथ जोड़कर यह निर्धारित करती है कि ‘स्वेच्छा से’ आघात कब माना जाएगा, जिससे जानबूझे या जानकर की गई हानि को पूर्णत: आकस्मिक चोट से अलग किया जाता है। यही परिभाषा आगे की दंडात्मक धाराओं, जैसे धारा 323, का आधार बनती है, जो विशेष रूप से स्वेच्छा से आघात पहुँचाने को दंडित करती हैं। भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत यही परिभाषा धारा 115(1) में यथावत रखी गई है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

अदालतें यह प्रमाण अपेक्षित करती हैं कि या तो आघात पहुँचाने का विशिष्ट अभिप्राय था, या यह ज्ञान था कि कार्य से आघात होने की संभावना है, और साथ ही यह भी सिद्ध होना चाहिए कि वास्तव में आघात हुआ; महज़ आकस्मिक चोट, बिना ऐसे अभिप्राय या ज्ञान के, इस परिभाषा के अंतर्गत नहीं आती।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: किसी व्यक्ति के कृत्य से हुई हर चोट ‘स्वेच्छा से आघात पहुँचाना’ मानी जाती है, चाहे वह पूरी तरह दुर्घटनावश ही क्यों न हुई हो।

    तथ्य: इस परिभाषा के लिए या तो आघात पहुँचाने का अभिप्राय चाहिए, या यह ज्ञान कि आघात होने की संभावना थी; केवल आकस्मिक रूप से हुई हानि, बिना अभिप्राय या ऐसे ज्ञान के, इसके अंतर्गत नहीं आती।