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सं Samvidhan

Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023

धारा 115

Voluntarily causing hurt

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह प्रावधान भारतीय दंड क़ानून परंपरा की एक दीर्घ धारा को आगे बढ़ाता है, जिसकी जड़ें भारतीय दंड संहिता, 1860 (धाराएँ 319–323) तक जाती हैं, जहाँ साधारण ‘चोट’ और अधिक गंभीर ‘गंभीर चोट’ में भेद किया गया था। भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने इस ढाँचे का पुनर्संगठन और पुनःसंख्या-निर्धारण किया है, जबकि मुख्य विचार को बरकरार रखा है: ऐसे कृत्यों को दंडित करना जो जान-बूझकर या जानकारी के साथ शारीरिक पीड़ा या हानि पहुँचाते हैं, जबकि अधिक कठोर दंड संहिता के अन्य भागों में वर्णित गंभीर या उत्तेजित रूपों की चोट के लिए सुरक्षित रखा गया है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

समकक्ष पुराने प्रावधानों के अंतर्गत, न्यायालयों ने सामान्यतः माना है कि ‘चोट’ का अर्थ शारीरिक पीड़ा, रोग, या दुर्बलता उत्पन्न करना है—यहाँ तक कि हल्की या अस्थायी पीड़ा भी पर्याप्त है। न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि स्वेच्छिकता के लिए या तो चोट पहुँचाने का इरादा होना चाहिए, या यह ज्ञान कि उस कृत्य से चोट लगना संभावित है; ऐसा पूर्णतः आकस्मिक आघात जिसमें न ऐसा इरादा हो न ऐसा ज्ञान, इस धारा के अंतर्गत नहीं आता। न्यायालयों ने ऐसे प्रावधान के अंतर्गत साधारण चोट को, गंभीर चोट या खतरनाक हथियारों से पहुँचाई गई चोट जैसे अधिक गंभीर अपराधों से पृथक माना है, जिन पर अलग और अधिक कठोर प्रावधान लागू होते हैं।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: यह धारा तभी लागू होती है जब चाकू या डंडे जैसे हथियार का प्रयोग किया गया हो।

    तथ्य: किसी हथियार की आवश्यकता नहीं है। कोई भी जान-बूझकर या जानते-बूझते किया गया कृत्य जो शारीरिक पीड़ा पहुँचाए—चाहे चाँटा हो या धक्का—इस धारा के तहत ‘स्वेच्छा से चोट पहुँचाना’ माना जा सकता है।

  • मिथक: यह धारा टूटी हुई हड्डियों या स्थायी विकलांगता जैसी गंभीर चोटों को कवर करती है।

    तथ्य: गंभीर चोटें ‘गंभीर चोट’ (grievous hurt) के अलग प्रावधानों में आती हैं। यह धारा साधारण, कम गम्भीर चोट के लिए बनी है।