Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023
धारा 116
Grievous hurt
The following kinds of hurt only are designated as “grievous”, namely:—
(a) Emasculation;
(b) Permanent privation of the sight of either eye;
(c) Permanent privation of the hearing of either ear;
(d) Privation of any member or joint;
(e) Destruction or permanent impairing of the powers of any member or joint;
(f) Permanent disfiguration of the head or face;
(g) Fracture or dislocation of a bone or tooth;
(h) Any hurt which endangers life or which causes the sufferer to be during the space of fifteen days in severe bodily pain, or unable to follow his ordinary pursuits.
सत्यापन प्रतीक्षित
यह क्यों है
औपनिवेशिक दौर के भारतीय दंड कानून (मूलतः Indian Penal Code, 1860 की धारा 320, जो Macaulay के अधीन तैयार हुई) को मामूली और गंभीर चोट में साफ़ रेखा चाहिए थी, क्योंकि सज़ा की कठोरता इस पर निर्भर करती है कि चोट कितनी गंभीर है। टूटी हड्डी, अंधत्व, या जानलेवा चोट जैसी विशिष्ट और वस्तुनिष्ठ श्रेणियाँ सूचीबद्ध करके, कानून ‘कितनी गंभीर’ जैसे धुंधले या व्यक्तिपरक आकलनों से बचना चाहता है और पुलिस, चिकित्सकों व न्यायालयों को ठोस जाँच‑सूची देता है। Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 ने इसे लगभग ज्यों‑का‑त्यों धारा 116 के रूप में आगे बढ़ाया है, जिससे एक सदी से अधिक की स्थापित व्याख्या निरंतर बनी रहती है।
न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं
पुरानी IPC धारा 320 (इसका समान पूर्ववर्ती) के तहत न्यायालयों ने माना है कि यह सूची पूर्ण है—जो चोट इन श्रेणियों में फिट नहीं बैठती, उसे चाहे जितनी गंभीर दिखे, ‘गंभीर’ नहीं कहा जा सकता। न्यायाधीशों ने यह भी स्पष्ट किया है कि उपबंध (h) के अंतर्गत ‘20 दिन तक तीव्र शारीरिक पीड़ा या साधारण कार्य‑व्यवहार करने में असमर्थता’ का चिकित्सकीय साक्ष्य से सिद्ध होना आवश्यक है; केवल दिखावे से नहीं। न्यायालयों ने यह भी कहा है कि फ्रैक्चर—चाहे हल्की हेयरलाइन ही क्यों न हो और X‑ray से पुष्ट हो—उपबंध (g) को संतुष्ट करता है, भले ही मरीज जल्दी ठीक हो जाए।
आम गलतफहमियाँ
मिथक: कोई भी दर्दनाक या खून निकलने वाली चोट ‘गंभीर चोट’ नहीं मानी जाती।
तथ्य: केवल वे ही चोटें ‘गंभीर चोट’ मानी जाएँगी जो धारा 116 में दी गई आठ विशिष्ट श्रेणियों में आती हैं—यह सूची पूरी और बाध्यकारी है, केवल एक संकेतक नहीं।
मिथक: कोई चीरा या सूजन जो बस देर से भरे, अपने‑आप ‘गंभीर’ नहीं हो जाता।
तथ्य: उपबंध (h) के तहत वही चोट आएगी जो जीवन के लिए ख़तरा पैदा करे, या कम से कम 15 दिन तक तीव्र पीड़ा दे या सामान्य कामकाज करने में असमर्थ कर दे—और आम तौर पर इसे चिकित्सकीय साक्ष्य से सिद्ध करना पड़ता है।