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सं Samvidhan

Indian Penal Code, 1860

धारा 320

repealed

Grievous hurt

सत्यापन प्रतीक्षित

यह क्यों है

यह धारा गंभीर चोटों की एक बंद और विशिष्ट सूची निर्धारित करती है, जिससे वे कम गंभीर चोटों से अलग पहचानी जाती हैं जिन्हें धारा 319 के अंतर्गत मात्र ‘चोट’ माना गया है। इस श्रेणीबद्ध वर्गीकरण से क़ानून को वास्तविक रूप से गम्भीर, जीवन-परिवर्तनकारी या ख़तरनाक चोटों पर कहीं कठोर दंड देने में सहायता मिलती है, ताकि दंड अनुपातिक रहे। भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023) में यही परिभाषा धारा 116 के अधीन बनी रही है, और इसमें एक अतिरिक्त श्रेणी जोड़ी गई है जो पीड़ित को वनस्पतिक अवस्था (vegetative state) में ले जाने वाली चोट को मान्यता देती है।

न्यायालय इसे कैसे पढ़ते हैं

न्यायालयों ने माना है कि यह सूची सम्पूर्ण (exhaustive) है; अतः जो चोट इन विशिष्ट श्रेणियों में नहीं आती, उसे चाहे वह देखने में कितनी भी गम्भीर लगे, ‘गंभीर चोट’ के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। हां, बीस दिन की तीव्र पीड़ा या असमर्थता वाले उपबंध की व्याख्या में प्रभाव की अवधि व तीव्रता सिद्ध करने हेतु विश्वसनीय चिकित्सकीय साक्ष्य अपेक्षित माना गया है।

आम गलतफहमियाँ
  • मिथक: कोई भी देखने में गम्भीर या दर्दनाक चोट ‘गंभीर चोट’ कहलाती है।

    तथ्य: केवल वही चोटें ‘गंभीर चोट’ मानी जाएंगी जो इस धारा में विशेष रूप से सूचीबद्ध हैं—जैसे दृष्टि, श्रवण या किसी अंग का स्थायी नाश, अस्थि-भंग, स्थायी विद्रूपण, या जीवन को संकट में डालने वाली क्षति, अथवा बीस दिन से अधिक तीव्र पीड़ा।